ग़ज़लें

1
बेवजह, बात बेबात होती, रही
तिश्नगी दिल मे सौग़ात होती, रही

जिस तरह अजनबी, अजनबी से मिले
ज़िंदगी से मुलाक़ात, होती रही

इक तरफ जीत के ख़्वाब ज़िंदा रहे
इक तरफ मात पे मात होती, रही

हाय लफ़्ज़ों के बाहर कोई क़द न था
सिर्फ लफ़्ज़ों मे औक़ात होती रही

नूर कुछ इस क़दर तीरगीबाज़ था
हर क़दम रौशनी, रात होती रही।

2
भूख के और प्यास के मंज़र
मुह के बल हैं,, विकास के मंज़र

घुंध ही धुंध, अब निगाहों मे
दूर लगते है, प्यास के मंज़र

तन पे परिधान, इस तरह से,, कुछ
उरियां – उरियां, लिबास के मंज़र

शीरनी गुम हुई, ,, ज़ुबानों की
कड़वे – कड़वे,, मिठास के मंज़र

सांप सूंघे हुए से लगते,,, हैं
‘नूर’ होशोहवास,,,,,, के,,, मंज़र।

3
अज़्म, हर बार, चुटकुले निकले
ख़्वाब, पानी के बुलबुले निकले

चीथड़ों – कीचड़ों के, पाले,,,, थे
सब के सब, दूध के धुले निकले

रौशनी,,,, और हो गई,,,,,, काली
धुंध के और सिलसिले,, निकले

जिनसे उम्मीद थी,, दिलेरी की
वो तो दिलदार,, दिलजले निकले

ढ़ूंढ़ने के पानियों के ,,नक्शेपा
नूर सहरा मे क़ाफ़िले,,,,, निकले

4
फ़क़त दीवार है,,, , छप्पर कहां है
ओ, सर वालो। तुम्हारा सर कहां है

ये कुछ भीगे हुए से रंग भर,,,, हैं
अरे। उस आग का मंज़र कहां है

अमां, बैठे हो, रोते हो, ग़ज़ब,,,, हो
तुम्हारे अज़्म का, लश्कर कहां है

बहुत तुम बोलते थे नूर,,,, भाई
तुम्हारी जीभ वो गज़भर कहां है

5
मौत से जो भी बेख़बर होंगें
सब वो जंगल के जानवर होंगें

फिर वही रास्ते, वही रहबर
फिर वही लोग हमसफर होंगें

आंधियां, पत्थरों की,,, आएगीं
और शीशों के गांव – घर होंगें

बात होगी,, अगरचे रोने की
लोग हंसते हुए,, मगर,,, होंगें

नूर गांवों में ,, थरथरी,,, होगी
सांप सूंघे हुए नगर,, होंगें