1
ख़ुशी के एक क़तरे को तरसती ज़िन्दगी है
चले आओ, तुम्हीं में दो जहानों की ख़ुशी है

सभी चीज़ें बहुत महफ़ूज़, हासिल, तयशुदा हैं
कमी है ज़िन्दगी में तो तुम्हारी ही कमी है

समंदर बेख़बर है प्यास से, कोई बताए
किसी ख़ुद्दार की कैसे तड़पती तिश्नगी है

ज़माना हो गया है चाँद को देखे मगर तो
ख़यालों में अभी तक रोशनी ही रोशनी है

सुकूँ मिलता नहीं दिल को कहीं भी और जाकर
तुम्हारी याद सी दिलकश न कोई दिलकशी है

फ़लक से एक पल को ही उतर आया करो तुम
ज़मीं पर मुंतज़िर रहती तुम्हारी दोस्ती है

मुहब्बत ही नहीं है वो, मुहब्बत का ख़ुदा है
‘सृजन’ का हर धड़कता हर्फ़ उसकी बंदगी है

2
ये आँखें हैं या अमृत के प्याले हैं?
महके-महके से हर सिम्त उजाले हैं

सुधियों में रस घोल रही हर आहट है
लगता है शायद वो आने वाले हैं

दिलवर तो दिलवर है, दिल में ही होगा
किस दुनिया में ढूँढ़ रहे दिलवाले हैं?

अपनी मंज़िल के आगे हम क्या देखें?
तुम देखो पाँवों में कितने छाले हैं

बंदिश को तुम बंदिश ही रहने देना
आँखों ने सब आँखों से कह डाले हैं

दिल का गोरापन राधा तक ले आया
वैसे तो केशव भी दिखते काले हैं

इक दिन ये संसार ग़ज़ल सा हो जाए
तय करके हम शौक ‘सृजन’ का पाले हैं

3
एक तस्वीर दे दो प्रिये
आँख में ही जला लें दिये

लड़खड़ाता रहे उम्र भर
जो तुम्हारे नयन से पिए

चाँद मन के गगन में उगा
नूर ही नूर बरसा किए

लेखनी के हुनरमंद को
भाव सारे तुम्हीं ने दिए

एक पन्ने सी है ज़िन्दगी
उसप’ दोनो तरफ़ हाशिये

ये न देखो जिए कब तलक
देखना किस तरह से जिए

चन्द पीपल उगा दो ख़ुदा!
तिलमिलाते शहर के लिए

साथ अपना ‘सृजन’ की ग़ज़ल
मैं रदीफ़ और तुम क़ाफ़िये

4
चाहतों की चाँदनी तैयार है थिरकने को
इशरतों की रोशनी हर सिम्त है बरसने को

ख़ैर मक़्दम के लिए मजमा लगा चकोरों का
क्या ज़मीं पर चौदवीं का चाँद है उतरने को?

डाल दो नज़रें जहाँ, सूरज वहाँ निकल जाए
इक नज़र तो देख लो, मजबूर हैं तरसने को

दिल शमां है, मोम आँसू, रोशनी मुहब्बत की
बिन तुम्हारे कुछ नहीं कुछ भी बहार भरने को

इश्क़ हरसिंगार है फिर क़ैद भी रहेगा क्या?
तेज़तर ख़ुशबू बनी है टूटकर बिखरने को

मुद्दतें जाती रही लेकिन खुशी नहीं देखी
तुम खुशी बनकर चले आओ ज़रा ठहरने को

देखकर तुमको ‘सृजन’ के आइने सँवरते हैं
अब सँवारो भी, जहाँ बेताब है सँवरने को