खिड़की से आती धूप
– रूबी भूषण
सूरज दिनों-दिन प्रचंड होता जा रहा था। उत्तर भारत सहित भारत के अधिकांश राज्य भीषण गर्मी और लू से त्रस्त थे। लाखों-लाख बच्चों के भाग्य का फैसला होना था।
परीक्षा भवन के बाहर आकर प्राची गर्मी से बेहाल थी।
“पप्पा!”
तेज धूप में सिर पर गमछा डाले विपिन सड़क के किनारे एक चाय की ठपरी के नीचे उकड़ूँ बैठा अपने को धूप से बचाने का व्यर्थ प्रयास कर रहा था। बड़ी-सी कोका-कोला की बोतल में पानी और दूसरी में चने का सत्तू घोलकर नीरू ने उसके साथ दे दिया था। एक पन्नी में थोड़ा-सा भुना हुआ गेहूँ और मकई का चबेना भी धर दिया था।
प्राची की आवाज़ सुनकर विपिन ने चिल्लाते हुए कहा, “इन्ने ताको, इधर परचिया इन्ने हैं। परीक्षा कैसी रही? बढ़िया गई न? माथा-उथा नहीं न घूमा गर्मी से? पानी-ऊनी तो पीती रही न?”
“पप्पा, एक्के साथ ही इतना सवाल पूछिएगा! हम लोगों के लिए का गर्मी, का जाड़ा—सब एक-सा है।”
दोनों घर आ गए।
आकाश में अँधियारा छाने लगा, पर मुई गर्मी कम लेने का नाम ही नहीं ले रही थी। विपिन ने दीवार पर एक तरफ टंगा छोटा-सा टीवी स्टार्ट कर दिया। न्यूज़ आ रही थी—“उत्तर भारत में लू और गर्मी का कहर जारी है। बिहार में गुरुवार को लू से सत्तावन लोगों की जान चली गई। वहीं, दो सौ पचास से अधिक लोग बीमार पड़ गए। उत्तर प्रदेश में अधिकतम तापमान 47 डिग्री से ऊपर पहुँच गया। ललितपुर में अधिक गर्मी के कारण सैकड़ों चमगादड़ों ने दम तोड़ दिया। दिल्ली का हाल और भी बुरा है। हज़ारों की संख्या में लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं।”
“ए जी, कोची लगा दिए हैं। एक तो गर्मी से माथा फटता है, ऊपर से ई सब न्यूज़ देखकर तलवा का लहर कपार पर चढ़ने लगता है।”
विपिन ने चैनल बदल दिया। दोनों अनुपमा सीरियल देखने लगे। एक तरफ कोने में नीतिश बैठकर पढ़ रहा था। बहुत मान-मनुहार के बाद प्राची ने जैसे-तैसे करके दो-चार कौर खाए और फिर पलंग की दूसरी ओर लुढ़क गई।
“का रे दीदिया, परीक्षा दे के आई है कि नशा करके आई है?” नीतिश ने कहा।
नीरू सुबह जब काम पर आई तो मैंने पूछा, “प्राची की परीक्षा कैसी रही?”
“का पता, कैसी रही? बोली, लिखे तो हैं।”
“आंटी, यह कम्पटीशन है। इसमें लिखा नहीं जाता, इसमें टिक लगाई जाती है।”
“का रॉम्पी बऊआ, हमको का पता!”
मुझे याद आया, आज से लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष पूर्व नीरू को लेकर उसकी ननद किरण हमारे पास आई थी। वह हमारी सोसाइटी में ठेला लगाकर कपड़े प्रेस करती थी। किरण ही हमारे कपड़े प्रेस करती थी। एक दिन वह अपने साथ नीरू और विपिन को लेकर आई।
नीरू और विपिन की बातों और उनके पहनावे से गाँव की मिट्टी की सोंधी महक आ रही थी। नीरू के माथे से घूँघट तनिक भी सरकता तो वह उसे हाथ से खींचकर नीचे ले आती। मैंने किरण से कहा, “अभी तो मैं बाहर जा रही हूँ, परंतु इसे मेरे पास भेजती रहना। कहीं भी कोई काम मिलता है तो मैं इसे अवश्य रखवा दूँगी।”
विपिन को मैंने कपड़े धोने के लिए रख लिया था। वह नित्य आता और बहुत साफ-सुथरे कपड़े धोकर फैलाता। कपड़ों की तह भी बड़े तरीके से लगाता था। एक-दो दिन के अंतराल के बाद नीरू आती। कभी मेरी पूरी छत धो जाती तो कभी झाड़ू-बुहारू भी कर जाती। धीरे-धीरे उसने सबका मन मोह लिया।
एक दिन बड़ी मुश्किल से उसे उल्टे पल्ले की साड़ी पहनाई गई। उसकी बोली में भी आंचलिकता धीरे-धीरे कम हो गई थी। खड़ी बोली का पुट अधिक नज़र आने लगा था। बच्चे हँसते—“नीरू आंटी बैंगन को टैगन बोलने लगी हैं।”
“ए भाभी, आपकी बालकनी से जो सामने वाला फ्लैट दिखाई देता है, 402 नंबर का, उसमें लगता है एक नया परिवार रहने आया है।”
“तुम्हें पूरे जगत की खबर रहती है!” दादा जी ने झल्लाते हुए कहा।
अपार्टमेंट, फ्लैट—भी क्या हो गया! उसमें रहने वाले लोगों का संबोधन ऐसे दिया जाता है, जैसे जेल में रहने वाले कैदी हों—“फ्लैट नंबर 302 में रहने वाले भैया”, “ये 602 वाली भाभी हैं।”
पहले मोहल्ले में दूर-दराज तक रहने वालों का नाम, उनके बच्चों का नाम, उनके पिता का नाम—सब मालूम रहता था। “जानती हो बहू, आज का ज़माना मुझसे देखा नहीं जाता। न खाने-पीने का शऊर है, न पहनने-ओढ़ने का। पैर छूकर आशीर्वाद लेने का तो छोड़ो, नमस्ते भी मुँह से नहीं निकलती। हाय-हाय करते रहेंगे। पता नहीं यह कैसा कलयुग है।”
दादा जी जब बोलना शुरू करते तो बोलते ही रह जाते। उम्र का तकाज़ा था, साथ ही पुरानी बातों को, पुराने संस्कारों को भूल भी तो नहीं पाए थे। मैं उनके सामने से हट गई।
फ्लैट पर लगी नेम प्लेट से पता चला कि या तो वे चिकित्सक हैं या पीएच.डी. वाले डॉक्टर। नाम लिखा था—डॉ. रजनीश एंड ऋचा कुलकर्णी।
उनके बगल के फ्लैट में डेज़ी डिसूज़ा अपने बेटे के साथ रहती थी। डेज़ी टेलीफोन डिपार्टमेंट में काम करती थी।
महिलाओं में भी मिस डेज़ी डिसूज़ा चर्चा का विषय बन गई थीं। कोई उनकी तरह फिगर बनाना चाहतीं तो कोई उनकी तरह ड्रेस-अप होना चाहतीं। डेज़ी डिसूज़ा का एक बेटा था और उनके पति शिपिंग कॉरपोरेशन में काम करते थे, जिसके कारण मिस्टर डिसूज़ा को साल के आठ महीने समुद्र में ही रहना पड़ता था।
“जानती हो बहू, कल मैं मॉर्निंग वॉक से लौट रहा था तो मिसेज़ डिसूज़ा और मिस्टर डिसूज़ा लिफ्ट पर मिले। अपने फ्लैट में ले गए और बड़े ही प्यार और सम्मान के साथ चाय पिलाई। इसी में देर हो गई। ठीक ही कहा जाता है, जिस घर की औरतें पढ़ी-लिखी होती हैं, वे सब कुछ बड़े ही सुचारु ढंग से करती हैं। मिसेज़ डिसूज़ा खुद जितनी स्मार्ट हैं, वैसे ही घर भी रखती हैं।”
“बाबूजी, ज़्यादा तारीफ़ न कीजिए। क्या मैं अच्छे से घर नहीं रखती?” मैंने कुढ़ते हुए कहा।
“इस उम्र में भी जलती हो, बहू! बच्चों की तरह।”
“और नहीं तो क्या? सुबह से उठकर सारा काम करती हूँ, रॉम्पी को पढ़ाती हूँ। सिर्फ नौकरी ही तो नहीं करती।”
“बाबूजी, इसे ज़्यादा न छेड़िए, नहीं तो आज संडे को अच्छा खाना भी मयस्सर नहीं होगा।”
रॉम्पी की हँसी ने माहौल को शांत कर दिया। मैंने झटपट सबको नाश्ता दिया।
किचन में चाय बना रही थी। कोई दो-तीन बार कॉलिंग बेल बजा चुका था, परंतु तीनों को सुनाई नहीं दे रहा था। मैं किचन से चिल्लाई, “रॉम्पी, दरवाज़ा क्यों नहीं खोलते? इतने देर से कॉलिंग बेल बज रही है।”
मैं चीखती हुई मेन गेट की ओर बढ़ी। दरवाज़ा खोला तो मिस्टर कुलकर्णी खड़े थे। मैंने मुस्कुराहट चेहरे पर लाते हुए जल्दी से अपनी ओढ़नी ठीक की और एक हाथ से बाल ठीक करते हुए उनका स्वागत किया।
“भाई साहब, सुबह-सुबह कैसे?”
“आज हॉलिडे था। सोचा, आप लोगों से मिल लूँ।”
“ज़रूर-ज़रूर।” उनके सामने पानी का गिलास रखते हुए मैंने कहा।
“गुड मॉर्निंग, कुलकर्णी जी। कैसे हैं आप?”
“फिट एंड फाइन।”
“ऑफकोर्स, डॉक्टर हैं।”
“अरे, न-न-न! मैं यहाँ महेंद्रा टेक कंपनी का एशिया हेड बनकर आया हूँ। मैंने पीएच.डी. की है।”
“दैट्स ग्रेट!”
“और बच्चे?”
“बाबूजी ने पीछे से आते हुए कहा।”
मिस्टर कुलकर्णी ने बाबूजी को प्रणाम किया।
“खुश रहो। तुम्हारा नाम क्या है, बेटा?”
“रजनीश कुलकर्णी।” सोफे पर बैठते हुए उन्होंने कहा।
“मेरी एक बेटी है। इस बार बारहवीं की परीक्षा दे रही है। उसकी बर्थडे है। मैं आप लोगों को इनवाइट करने आया हूँ।”
“इस बार यामिनी सोलह वर्ष की हो रही है। एक तारीख को फ्लैट के ऊपर बने कम्युनिटी हॉल में एक छोटा-सा गेट-टुगेदर रखा है। यामिनी की बर्थडे भी है।”
“हाँ-हाँ, यह ज़रूरी है, बेटा। वरना इसी बिल्डिंग में कौन रहता है, पता ही नहीं चलता।”
बाबूजी और शुरू होते कि किशोर ने कहा, “हम ज़रूर आएँगे।”
एक तारीख को बाबूजी ने सुबह-सुबह याद दिलाया, “आज रजनीश की बेटी का जन्मदिन है। टाइम से आ जाना।”
शाम को हम लोग ऊपर हॉल में पहुँचे। बैलून और फूलों से सजा हॉल, जिसमें रंग-बिरंगी लाइटें जगमगा रही थीं। मैंने देखा, नीरू और विपिन भाग-भागकर काम में लगे थे।
मेन गेट से मिसेज़ कुलकर्णी और उनकी बेटी यामिनी ने परियों की तरह हॉल में प्रवेश किया।
“लेडीज़ एंड जेंटलमैन, हमारे सामने हैं ब्यूटीफुल लेडी यामिनी और उसकी मम्मी ऋचा।”
मंच पर खड़े उद्घोषक ने कहा।
यामिनी जैसे ही टेबल के सामने केक काटने पहुँची, केक को देखा और ज़ोर से बोली, “पापा, यह क्या! मैंने कहा था कि चॉकलेट केक चाहिए और यह पाइनएप्पल फ्लेवर का है।”
ऋचा कुलकर्णी ने रजनीश को घूरते हुए देखा, “मैंने कहा था न तुमसे, बेबी को चॉकलेट फ्लेवर पसंद है। फिर तुमने गलती कर दी।”
यामिनी की आँखों से आँसू टपक रहे थे। रजनीश और ऋचा उसे समझाने की कोशिश में लगे थे, परंतु वह समझने को तैयार नहीं थी।
ऋचा कुलकर्णी फोन से बगल वाली शॉप से चॉकलेट केक मंगाने का ऑर्डर देने लगीं। चिल्लाकर अपने छोटे भाई से कहा, “बेबी का मूड एक्सपायर हो गया और तुम लोग नाच-गा रहे हो।”
हॉल में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया।
“अरे! बेटा, यहीं केक काट लो और दोबारा जब चॉकलेट केक आ जाए तो फिर काट लेना और खा लेना।”
बाबूजी अपनी आदत के अनुसार बोल पड़े।
रॉम्पी ने धीरे से कहा, “मम्मी, यह परिवार पूरा का पूरा सनकी है क्या?”
मैंने ज़ोर से रॉम्पी का हाथ दबाया, “तुम दादा-पोता कहीं भी चालू हो जाते हो।”
नीरू ने धीरे से आकर कहा, “अरे! ई केक जल्दी कट जाता और खाना-पीना हो जाता, तब हम भी घर चल जाते और केक और बचा खाना दोनों बचवा को खिला देते।”
हॉल में उद्घोषक ने कहा, “जब तक यंग लेडी की पसंद का केक आ रहा है, तो क्यों न हम यामिनी से कुछ सुनें?”
“ये-ये-ये…”
“मेरी ब्यूटीफुल डॉक्टर बहुत अच्छा गाना गाती है।”
रजनीश और ऋचा यामिनी को मनाने में लगे थे।
“बेटा यामिनी, यह ठीक नहीं लग रहा। मैं प्रॉमिस करता हूँ, अब कोई गलती नहीं होगी।”
खैर भैया, यामिनी मान-मनुहार के बाद बड़ी देर से उठी। ठीक-ठाक गाना गाया।
“देखा न आप सबने! मैं कहता था, मेरी बेटी की आवाज़ लता मंगेशकर से मिलती है।”
माँ-बाप ज़ोर-ज़ोर से ताली बजाने लगे।
“मम्मी, देखो, यामिनी कितनी खुशकिस्मत है। उसके मम्मी-पापा उसका कितना ध्यान रखते हैं।”
रजनीश ने घूरते हुए रॉम्पी को देखा। वह चुपचाप बैठा रहा। पूरी पार्टी में रजनीश और ऋचा कुलकर्णी मेहमानों से ज्यादा अपनी बच्ची में लगे रहे।
दूसरे दिन सुबह जब नीरू काम पर आई तो उसने बताया, “भाभी, यामिनी जे है न, एगो काम न करती है। दूसरे का तो छोड़ो, अपना भी काम नहीं करती है। जैसे ही मुँह से कुछ निकालेगी, उसके आगे धर दिया जाता है। माँ-बाप डाँटना तो छोड़िए, हर समय बेबी-बेबी। पार्टी में दिन भर हम दोनों इतना खटबो किए और हमारा बच्चा दूनों बिना खाए-पिए सो गया। खाना भी नहीं दी। सुबह बोली थी कि रात में खाना मत बना, हम दे देंगे। पर उनकी दुलारी बेटी तुनक गई तो तुनक गई। दोनों उसी में लग गए। हम कितनी देर इंतज़ार करते? बोलिए।”
कुछ दिनों बाद बारहवीं का रिजल्ट आ गया। रॉम्पी को 89 प्रतिशत नंबर आए, प्राची को 88 प्रतिशत।
“भाभी, कल भोर में हम नहीं आएँगे। हनुमान मंदिर प्रसादी चढ़ाने जाएँगे।”
“हाँ, मत आना।” मैंने नीरू से कहा।
किशोर ने अगले दिन छुट्टी ले ली और हम सब रॉम्पी को लेकर पिक्चर दिखाने मॉल गए।
“अरे भाई साहब, आप सब भी इसी मॉल में?”
“हाँ। कल यामिनी का रिजल्ट आया है। 96 प्रतिशत नंबर लाई है। बहुत ही तेज़ है पढ़ने में मेरी गुड़िया।”
ऋचा कुलकर्णी ने यामिनी के बालों को सहलाते हुए कहा।
“व्हाट इज़ दिस, मम्मी! मेरे बाल मत छुओ, बिगड़ जाएँगे। अभी सेट करके आई हूँ।”
“हाय रॉम्पी!”
“हैलो यामिनी।”
“क्या गिफ्ट मिली तुमको पास होने पर?”
“पापा ने मुझे एप्पल का लैपटॉप दिलाने का प्रॉमिस किया है।” रॉम्पी ने कहा।
“मैंने तो कह दिया है कि मैं वर्ल्ड टूर पर जाऊँगी।”
“सही है।”
कहकर वे लोग अलग चले गए और हम अलग।
होटल में खाने के दौरान मैंने देखा, रॉम्पी कुछ चुप-चुप-सा है। पिक्चर की बात भी नहीं कर रहा है। मॉल आने के पहले तक चहक रहा था।
“श्रद्धा कपूर ने अच्छा काम किया है। स्त्री-2, स्त्री-1 से ज्यादा अच्छी मूवी लगी।”
“हुम्म।”
किशोर ने पूछा, “इसको क्या हुआ?”
“पता नहीं।”
“पहले तो हँस रहा था, अचानक न जाने क्या हुआ?”
“कहीं इश्क-विश्क का चक्कर तो नहीं है। क्या रॉम्पी, यामिनी अच्छी लगती है क्या?”
“मम्मी, इस तरह से मुझसे बात मत करिए। उसकी क्या तक़दीर है! वर्ल्ड टूर पर जा रही है। कहाँ वह, कहाँ मैं। उसके मुँह से कुछ निकलता नहीं कि आंटी-अंकल…”
“ठीक है, हम अच्छे माँ-बाप नहीं हैं, यही कहना चाहते हो न? जानते हो, तुम्हारे पापा बैंक में काम करते हैं। उन्होंने अपने जीवन में पूरे परिवार को देखा है। दो-दो बुआओं की शादी करवाई। दादी का कैंसर का इलाज कराया। तुम्हें भी कोई कमी नहीं होने देते, लेकिन न जाने तुम्हें क्यों लगता है कि हम तुम्हारा ध्यान नहीं रखते। बेटे हो हमारे। तुम्हें प्यार नहीं करेंगे तो किसे करेंगे?”
“मेरे मुँह से कुछ निकलता नहीं कि मम्मी, तुम टोक देती हो। यामिनी कुछ एक बार में माँगती है, उसकी माँग पूरी हो जाती है। उसके मुँह से कभी ‘अंकल-आंटी’ नहीं निकलता।”
“अपने से नीचे प्राची को भी देखो। वह कितने अभाव में पल रही है, लेकिन हरदम हँसती रहती है।”
किशोर समझ चुके थे कि माँ-बेटे का झगड़ा अधिक बढ़ जाएगा। उन्होंने बात सँभालते हुए कहा, “बेटा, हम तुम्हें हथेली पर रखते हैं। मिस्टर कुलकर्णी की तरह हम नहीं हो सकते। वह अपनी बेटी को हथेली पर नहीं, उँगली के पोरों पर पाल रहे हैं। सबका अपना-अपना ढंग है।”
रॉम्पी घड़ी की ओर देखते हुए मैंने कहा, “क्यों न लैपटॉप दिलाने के बाद रॉम्पू को एप्पल वॉच भी दिलवा देंगे?”
किशोर ने कहा, “अभी मैं पक्का तो नहीं कह सकता, परंतु कोशिश करूँगा कि जल्दी ही तुम्हारे रॉम्पू को एप्पल वॉच भी दिला दूँगा।”
रॉम्पी का मुरझाया चेहरा खिल गया और मेन्यू चार्ट देखकर टपर-टपर ऑर्डर देने लगा।
घर पहुँचे तो देखा, प्राची एक प्लेट में चार लड्डू लिए खड़ी है।
“रॉम्पू भैया, प्रसाद खाओ।”
“वाह रे प्राची! तूने तो गज़ब कर दिया। क्या नंबर लाई है! अब मस्ती टाइम।”
“वही भैया, अब मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी करना है। तुम भी तो मेडिकल की तैयारी कर रहे हो न?”
“नहीं, मैं लॉ करूँगा। क्लैट की तैयारी करूँगा। डिसूज़ा आंटी के बेटे की तरह।”
“गुड नाइट, भैया। दादा जी, प्रणाम। आंटी, चलती हूँ।”
कहकर प्राची चली गई।
मैंने रॉम्पी को सुनाते हुए कहा, “हुँह! इस लड़की की बात तो इसके दिमाग में आई नहीं होगी कि कल से ही तैयारी शुरू कर रही है।”
“पागल हो गई हो क्या? क्यों बड़बड़ा रही हो? वह तो अच्छा है कि रॉम्पी ने सुना नहीं।” किशोर ने समझाते हुए कहा।
“मैं उसी को सुनाने के लिए ही कह रही थी।”
प्राची और रॉम्पी अपने-अपने कम्पटीशन की तैयारी में लग गए।
“मम्मी, जानती हो, यामिनी वर्ल्ड टूर से लौट आई। फ्रेश लग रही है। अब वह जो फ्रेश माइंड से तैयारी करेगी, एक बार में कम्पटीशन क्रैक कर देगी।”
मेरा मन किया कि जवाब दूँ, पर…
शाम को अपार्टमेंट में जो बच्चे उधम मचाते, खेलते थे, वे अब बड़े हो गए थे। उनकी जगह नए छोटे बच्चे खेलने लगे थे।
जो बड़े हो गए थे, वे अपनी ज़िंदगी बनाने की जद्दोजहद में लग गए थे।
यामिनी पढ़ती रहती। ऋचा और रजनीश हमेशा यामिनी को समझाते, “तू इतनी तेज़ है कि फटाक से, चुटकी बजाकर निकल जाएगी। हम हैं न…।”
वहीं प्राची भी लगी रहती। रॉम्पी मस्तमौला—खूब पढ़ता, खूब मस्ती करता।
आज प्राची और न जाने कितने बच्चे मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट देकर आए। शाम को कैंपस में टहलते हुए प्राची और यामिनी बतिया रही थीं।
“प्राची, मैं अपने पर कॉन्फिडेंट हूँ। निकल जाऊँगी। मम्मी-पापा भी यही कहते हैं। मैं जो चाहती हूँ, सोचती हूँ, वह पूरा होता है।”
“हाँ, यामिनी, आप ठीक कह रही हैं। हम भी तैयारी तो पूरी किए हैं, पर कोचिंग नहीं कर पाए। सोचे, इतना पैसा कहाँ से आएगा? वह तो आप हमको गाइड कर देती हैं, स्टडी मटेरियल दे देती हैं। इस बार हुआ-हुआ नहीं तो अगले बार पुनः बैठूँगी।”
कुछ दिनों बाद नीट का रिजल्ट निकल आया। रिजल्ट का इंतज़ार न जाने कितने बच्चे कर रहे थे। रिजल्ट आ गया। प्राची का नाम नहीं था।
अगले दिन मिसेज़ डिसूज़ा का फोन आया, “अपना मोबाइल खोलिए, रील देखिए। हमारी अपार्टमेंट की छत से वह कूद गई है। नीचे खड़े लोगों ने चिल्लाकर बहुत मना किया कि नीचे उतर जाओ, पर उसने नहीं सुना। हाथ फैलाकर नीचे कूद गई।”
“कौन, कौन कूद गई?”
“यामिनी…”
ऋचा और रजनीश ड्राइंग रूम में बैठकर आराम से टीवी देख रहे थे। यामिनी ने कहा, “मैं छत पर टहलने जा रही हूँ।”
कुछ समय बाद नीचे से गार्ड भागता हुआ आया और उसने बताया कि यामिनी छत से कूद गई है। तब उन्हें पता चला।
हम सब भागकर ऋचा के फ्लैट में पहुँचे। पुलिस आई हुई थी। उन्होंने सबको जाने को कह दिया। रजनीश यामिनी को लेकर सिटी हॉस्पिटल की ओर भागे।
उसके कमरे की तलाशी ली जा रही थी। तलाशी लेने पर यामिनी के कमरे से एक नोट निकला, जिस पर लिखा था—“मैं हारना नहीं जानती।”
प्राची और रॉम्पी हतप्रभ थे। समझ नहीं पा रहे थे। यामिनी का मल्टीपल फ्रैक्चर हुआ था। बेड पर प्लास्टर में लिपटी, आई.सी.यू. से बाहर आ गई थी। तब प्राची और रॉम्पी उससे मिलने गए।
“कैसी हो, यामिनी?” रॉम्पी ने पूछा।
प्राची स्टूल पर बैठी यामिनी के बाल सहला रही थी।
कमज़ोर आवाज़ में यामिनी बोली, “मैं हार गई, प्राची। बचपन से हारना नहीं सीखा था। जो चाहती, मिल जाता। मम्मी-पापा मेरे लिए अलाउद्दीन के चिराग वाले जिन्न हैं।”
“चुप रहिए, यामिनी। कुछ मत कहिए। आप फिर जीतेंगी। कौन कहता है आप हार गईं?”
“अरे यार, चिल्ल रहने का। खाओ-पिओ और खूब मस्ती करो। जितनी देर पढ़ना है, जी लगाकर पढ़ो।”
रॉम्पी ने अपने बिंदास अंदाज़ में कहा।
“आपको जीना होगा, यामिनी। मैं भी तो कहाँ निकाल पाई कम्पटीशन! अगला साल हमारा होगा। अभी आप अपने को ठीक कीजिए।”
“मैं किसी को क्या मुँह दिखाऊँगी? मुझे जब सब देखेंगे तो यही सोचेंगे न—‘वह देखो, जीवन से फेलियर लड़की।’ इसीलिए मैं जीना नहीं चाहती।”
“कल जब आप सफल हो जाएँगी, तब किसी को कुछ याद नहीं रहेगा। क्या आपको एक बार भी अंकल-आंटी का ध्यान नहीं आता? आपके जाने के बाद उनका क्या होगा? वे दोनों जीते-जी मर जाएँगे।”
“तुम ठीक कहती हो। मरना तो मुमकिन नहीं हुआ। एक बार फिर जीकर देखती हूँ।” यामिनी ने कहा।
प्राची की बातें रजनीश और ऋचा सुन रहे थे और खुद की गलती तलाशने की कोशिश कर रहे थे।
प्राची ने आगे बढ़कर खिड़की पर पड़े पर्दे हटा दिए। शीशे की खिड़की से धूप छनकर भीतर आ रही थी।
रॉम्पी और प्राची वापस चल पड़े।
