रामचंद्र ने दी थियेटर को समृद्धि

अभिनेता रामचंद्र सिंह के जुनून ने इन्हें रंगमंच के मुकाम तक पहुंचाया. बचपन से लेकर युवावस्था तक संर्घषमय जीवन में अभिनय इनके हर क्षण का साथी रहा है। बचपन में एक्टर बनने की चाह थी। फिल्मों में काम करने के षौक ने इन्हें अभिनय में पारंगत किया.देष के विभिन्न थियेटर से जुड़ कर इन्होंने रंगमंच को समृद्धि दी। अभिनय यात्रा के दौरान ये मशहूर नाटककार हबीब तनवीर से जुड़े। इनके निर्देषन में इन्होंने देश-विदेश में एक सौ से अधिक प्रस्तुतियां दी। अभिनय में इनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2016 में इन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया। यहां रामचंद्र सिंह की अभिनय-यात्रा को हम पाठकों से साझा कर रहे हैं – विनय

रामचंद्र सिंह का जन्म रक्सौल के गम्हरिया. गांव में हुआ है. यहां इन्होंने मैट्रिक तक पढ़ाई की. बचपन से ही नाटकों में इनका रुझान था. दिन भर यही पता करता थे कि किस गांव में नाटक हो रहा है. पढ़ाई इनके लिए सेकेंडरी थी. ये आठवीं क्लास से ही पढ़ाई छोड़ कर नाटकों में काम करने के लिए घूमने लगे. गम्हरिया गांव में पूरे वर्ष भर दो नाटक हुआ करते

थे. चंदा करके नाटक होता था. भाड़े पर लौंडा को बुलाया जाता था. पेट्रोमेक्स लाइट की रोशनी में लोग नाटक का लुत्फ उठाते थे. देवी स्थान पर सरस्वती पूजा के समय नाटक होता था. इनकी चाची व मां ललिता देवी बिहार के पारंपरिक आनुष्ठानिक नृत्य डोमकछ में गाना गाती थीं .ये छुप-छुप कर देखते थे. सावन के महीने में बिहार की परंपरागत लोक-नाट्य जट-जटिन का खेल हुआ करता था. ये गांव की औरतें ही करती थीं. इसमें दो झुंड बनता था। इसमें एक प्रश्न करता था तो दूसरा जवाब देता था. महिलाएं ढोलक बजाती थीं। वे एक दूसरे को पकड़ कर गाती थीं. गांव में उस समय शादियों में नाच हुआ करता था, वह इन्हंे अच्छा लगता था. ये नाच देखने के लिए दूर-दराज के गांव में चले जाते थे. नतीजा मैट्रिक में दस विषय में फेल हो गए। रात भर नाच देखना और दिन में वीरगंज जाकर फिल्में देखना इनका रूटीन था। ये स्कूल से आधी क्लास कर फिल्म देखने भाग जाते थे। आगे की सीट पर बैठ कर फिल्म देखते थे. रामचंद्र सिंह बताते हैं कि 1975 में सिनेमाघरों में 40 पैसे का टिकट लगता था. वे घर से फिल्म देखने भाग कर जाते थे। गंम्हरिया से रक्सौल पांच किलोमीटर और वहां से वीरगंज ढ़ाई किमी पैदल जाते थे. उस वक्त 25 पैसे नाश्ते के लिए मिलते थे. उसे वे खर्च नहीं करते थे. बाबूजी के पास पैसा नहीं होता था तो मेरी माता धान व गेहूं दे देती थी, कहती थी बउआ एकरा बेच के नाश्ता कर लिह. एक मुट्ठी और धान रखवा कर ले जाते थे. खाना नहीं खाते थे. धान बेच कर फिल्म देखते थे. दिन भर घूमने व रात में नाटक देखने के कारण ही वे मैटिक की परीक्षा में सभी विशयों में फेल हो गए। इसके बाद से फिर बाबूजी टृयूशन पढ्ने के लिए शिक्षक रख दिए. बाबूजी ने कहा कि फेर पढ़. पिताजी व माताजी ने कभी किसी चीज का प्रेशर नहीं दिया. मां कहती थी, बउआ झूठ न बोलेके, इ सब खराब हउअे पाप हउअे. मां पकड़ कर रोने लगती थी. मेरी दादी कहानियां सुनाया करती थी. लोरिक बृजभार की कहानी सुनाती थीं.

रामचंद्र सिंह कहते हैं कि हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए बेतिया के महारानी जानकी कुंवर कॉलेज में एडमिशन लिया. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी ये हमेशा गांव आते थे.यहां नाटक भी करते थे. उस वक्त भी गांव में लौंडा नाच हुआ करता था। रामचंद्र सिंह बताते हैं कि गांव में जिन नाटकों का निर्देषन उन्होंने किया, उनमें सीन चेंज होने के समय लौंडा नाच करता था. उस समय ऐसा माना जाता था कि जिस नाटक में लौंडा नहीं हो तो वह फेल है. नाटक के लिए लौंडा साटा पर लाते थे. उस वक्त लौंडा 300 रुपये लेता था। साजिंदे भी साथ आते थे. गांव में कई नाटकों का निर्देषन फुफेरे भाई जयप्रकाश नारायण सिंह ने किया. पढ़ाई के साथ नाटक चलता रहा. ग्रेजुएषन करने के बाद पिताजी ने कहा. आइएसए की तैयारी करो. इसी दौरान सेना में भरती के लिए परीक्षा दी थी, लेकिन ज्वाइनिंग लेटर देर से मिला. उसे फाड़ कर फेंक दिया.
बेतिया में एक साल रह कर घर चला आया. प्रारंभिक परीक्षा पास की, लेकिन मन नहीं रमा। मुख्य परीक्षा छोड़ दी. मेरे पिता व चाचा दोनों पुलिस में थे। मैंने पुलिस विभाग का भ्रष्टाचार करीब से देखा था. मुझे इस नौकरी से घृणा हो गयी. आइएएस की तैयारी छोड़ने के बाद बेकार हो गया. इसी दौरान मेरे दिमाग में यह बात आयी कि एक्टर बनना है. मायापुरी से फिल्मी एक्टरों का जीवनी पढ़ने लगा. मुझे लगा कि ऐसे नाटक करके ही ये लोग अभिनेता बने हैं. एक्टर बनने के लिए बनारस गया. तब उसी दौरान पता चला कि एनएसडी में एक्टिंग सिखाया जाता है. एनएसडी के लिए फॉर्म भर दिया. कुछ दिनों बाद लखनऊ के भारतेंदु नाट्य एकेडमी में कोर्स की जानकारी मिली. उस वक्त इतना पता था कि अनुपम खेर वहां पढ़ाने जाते हैं. मैंने सोचा कि यहां पढूंगा तो अनुपम खेर मुझे फिल्मों में काम दिलवा देंगे. यही सोच कर मैंने फॉर्म भरा था.
मुझे ऑडिशन में बुलाया गया, लेकिन ऑडिशन क्या होता है, यह मुझे नहीं पता था. इंटरव्यू लेने वालों ने मुझे गाना सुनाने को कहा, मैंने भोजपुरी में गाना सुनाया. उनलोगो ने कहा, एक्टिंग सीख कर क्या करोगे, मैंने कहा गांव में नाटक करूंगा. मेरा एडमिशन हो गया, लेकिन स्कॉलरशिप में मेरा नाम नहीं था. मैं दिन में क्लास करता और रात में लखनउ स्टेेषन पर जाकर रात बिताता. कुछ महीने में मेरे कुछ मित्र बने. उन लोगों ने मुझे अपने रूम में रखा. चचेरे भाई जयप्रकाश सिंह ने हौसला बनाया कि पचास रुपया महीना हम देंगे. कोलकता के एक चचेरे भाई ने 150 रुपया देने का वादा किया. इन लोगों की बदौलत मेरे रहने व खाने की सुविधा मिल गयी. उस वक्त स्टेशन पर तीन रुपये में खाना मिलता था. तीन महीने के बाद एक लिस्ट निकला उसके स्कॉलरशिप में मेरा नाम आया. इसके बाद मैने अपने लिए कपड़े खरीदे.

एडमिशन तो लिया, लेकिन भोजपुरी ही जानता था, शुद्ध हिंदी नहीं आती थी. धूप को घाम कहते था. दोस्तों ने बताया कि घाम नहीं धूप कहते हैं. दिल्ली को डिल्ली कहता था. दोस्तों ने मुझे हिंदी बोलना सिखाया. इसी दौरान मेरे सीनियर ललित सिंह पोखरियां ने नाटक में रोल दिया. विजय शुक्ला हिंदी थियेटर के मशहूर अभिनेता माने जाते थे, उन्होंने नाटक में काम किया था. मैंने स्टेज क्राफ्ट भी वहीं सीखा. एक साल रेपेटरी में अपरेंटिस के तौर पर मुझे रखा गया. 1200 रुपये तनख्वाह थे.इसी दौरान माताजी बीमार पड़ी. रुपयों के अभाव में वह बिना इलाज के वह गुजर गयी. जब वह बीमार पड़ी तो उन्होंने घर में सभी को मुझे बताने से मना कर दिया. उन्हें लगा कि मुझे बुलाया जायेगा तो मेरे काम पर असर पड़ेगा. मां के निधन के बाद मुझे पता चला कि माँ अब नहीं है. सूचना मिलते ही मैं तुरंत घर भागा. पास में रुपये नहीं थे, बिना टिकट घर गया. नाटक करने वालों की यह हैसियत नहीं कि वह रेल का किराया दे. उसके बाद से मैने रेल का किराया देना छोड़ दिया. कई बार पकड़े गये. लखनउ, देवरिया, मोतिहारी में टीटी ने पकड़ा. मैंने कहा जेल में डाल दीजिये, लेकिन सबने मुझे छोड़ दिया. इसी दौरान मेरे मित्र विजय षुक्ला ने हबीब तनवीर साहब के बारे में बताया.

हबीब साहब के यहां आने के बाद नये सिरे से शुरुआत की. नये सिरे से ट्रेनिंग लिया. मैं उनके पास 1992 में गया था. उन्होंने तीन दिन ऑडिशन लिया. एक्टिंग देखी. तीन दिन बाद बोले कि एशियाड विलेज में फ्लैट है. जाओ वहीं रहो. हमने आपको अपने नाट्य ग्रुप में भरती कर लिया. आपकी महीने के छह सौ रुपये तनख्वाह होगी. उस वक्त जर्मनी के राइटर स्टेफिन जुई की कहानी ,अनडाइन मैन को लेकर नाटक तैयार किया गया. 1993 में श्रीराम सेंटर में शो हुआ. उसमें मैंने रॉल किया. उस वक्त मुझे 104 डिग्री बुखार था. हबीब साहब शो को लेकर चिंतित थे, लेकिन मैंने रॉल किया. 1993 में इंग्लैंड के लेस्टर शहर में शो हुआ. यहां 19 दिनों का दौरा था. इतने दिन विदेश में रहना मेरे लिए अच्छी अनुभूति थी. स्काटलैंड में. रहन-सहन अच्छा लगा. वहां की लोगों के जीवन-यापन व सामाजिकता अच्छी लगी. हबीब साहब के निर्देशन में षो करने पर कुछ पैसे मिले. लोन से मुक्ति मिली. यहां से लौटने के बाद वापस घर गये. इसके बाद हम जर्मनी के ब्रेमेन गये. यहां शेक्सपीयर पर फेस्टिवल हो रहा था. यहां तीन शो हुए..यहां ए मिड समरनाइट्स ड्रीम हिंदी में कामदेव का अपना वसंतऋतु का सपना का मंचन हुआ था. नाटक हिंदी व छत्तीसगढी में था. नाटक का संवाद जर्मन की भाषा में अनुवाद हो रहा था. मै। इसमें ऑबरॉन का रोल कर रहा था. मै जब जर्मनी में था, तभी मेरे पिताजी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. शो के बाद जब मैं खाना खाने बैठा तो खाना टेबुल पर गिर गया. मुझे शंका हुई. लेकिन मन मसोस कर काम करता रहा. उस वक्त फोन की भी सुविधा नहीं थी. पत्नी के पास फोन नहीं था. शो की अवधि के बाद भोपाल आया तो पत्नी ने रोते हुए कहा कि बाबूजी पूणा में भाई के पास थे, वहीं कल रात गुजर गये हैं. भाई को फोन किया कि मै आ रहा हूं. उस समय मेरे पास एक भी रुपये नहीं थे. हबीब साहब दिल्ली से त्रिशूर चले गये थे. मित्र अनूप रंजन पांडेय ने किसी से चार हजार उधार दिलवाया. उसके बाद हम पत्नी क साथ पूणा गये. पिता का दाह संस्कार किया. दाह-संस्कार के बाद गंभरिया आये. खेत गिरवी रख कर कर्ज लिया, इससे पिता का अंतिम संस्कार हुआ. लखनऊ में रहते समय मां को खो दिया.व जर्मनी में था तो पिताजी चले गये. मैं थियेटर का कर्जदार बनता गया. धीरे-धीरे महीने के वेतन से सबको चुकाया. उस समय मेरी तनख्वाह 1500 रुपये थी. नाटकों में ऐसा रमा कि फिल्मों में एक्टर बनने का इरादा धीरे-धीरे समाप्त होने लगा. नाटक से ऐसी शोहरत मिली. जिस शहर में शो होता था, वहां हबीब साहब को छोड़ कर लोग मेरे पीछे पड जाते थे. धीरे-धीरे नाटकों का सिलसिला बढ़ता गया. हबीब साहब बीमार रहने लगे. एक दिन उन्होंने भी दुनिया छोड़ दिया. मृत्यु से पूर्व उन्होंने मुझे नया थियेटर के निर्देशन का जिम्मा सौंप दिया था. नाटकों में काम के दौरान मुझे संस्कृति मंत्रालय को सीनियर फेलोशिप मिला. आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव में सारे कलाकार मेरे ग्रुप के थे. लेकिन में नये नाटक की तैयारी में व्यस्त रहा. फिल्मों की अपेक्षा थियेटर से ही मुझे ज्यादा संतुष्टि मिलती रही. थियेटर के प्रति मेरे जुनून को देखते हुए मुझे 2016 में संगीत नाटक अकादमी का अवार्ड दिया गया. मेरे जीवन का यही उद्देेष्य है कि ताउम्र थियेटर कर समाज को नाटकों के माध्यम से जाग्रत करता रहूं.

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