गर्म हवा के थपेड़े सहती सत्तर के दशक की युवा पीढ़ी :: शरद कोकास

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गर्म हवा ’ के थपेड़े सहती सत्तर के दशक की युवा पीढ़ी
                                                            –  शरद कोकास
आज़ादी के तुरंत बाद का समय अराजकता के भय से मुक्ति और आँखों में कष्टमुक्त स्वप्न पालने का समय था ।
बरसों बरस विदेशी सत्ता के अधीन रह चुकी जनता के दुःख अपनी सीमा पार कर चुके थे । रोजी –रोटी की व्यवस्था के साथ अब उसे दुखों से मुक्ति का उपाय भी चाहिए था । विभाजन की त्रासदी से उबरने के बाद वह कुछ समय का विश्राम भी चाहती थी ।
*यह मनुष्य की सामान्य प्रवृति है कि कठोर परिश्रम के पश्चात उसे ऐसे विश्राम एवं मनोरंजन की आवश्यकता होती है जो उसके श्रम और कष्ट के अहसास को भूलने में उसकी मदद करे ।*
देश की जनता भी देश के नवनिर्माण और भविष्य की योजनाओं को राजनेताओं के हाथों में सौंपकर कुछ समय के लिए सुन्दर ,सुखद भविष्य के ख़्वाब देखते हुए मीठी नींद में सो जाना चाहती थी ।
जनता की नींद में सुहावने , रंगबिरंगे , गुदगुदाने वाले ,रूमानियत से भरे सपने परोसने का यह काम आज़ादी के बाद के दशकों की फिल्मों ने बखूबी किया । प्रेम, विरह जैसी रूमानी भावनाओं से ओतप्रोत , सामाजिक पारिवारिक संबंधों और पौराणिक कथाओं पर आधारित कहानियों और स्वप्न दृश्यों की श्रंखला से निर्मित फिल्मों ने जनता का खूब मनोरंजन किया ।
यही हाल भारत से बिछुड़कर हाल में ही बने देश पाकिस्तान का भी था , वहां हास्य प्रधान नाटकों की भरमार थी । यद्यपि तकनीकी कारणों से पाकिस्तान का सिनेमा भारतीय सिनेमा के बराबर नहीं था लेकिन कला , संस्कृति के अन्य क्षेत्रों में वह हिंदुस्तान के कदम से कदम मिला कर चल रहा था ।
*दोनों देशों की बहुसंख्य जनता के धर्म भले ही अलग हों लेकिन इतिहास और संस्कृति तो एक ही हैं ।*
लेकिन मीठी नींद में सुलाने वाले इन सपनों का दौर अधिक नहीं चला । स्वतंत्रता प्राप्ति का सुख जैसे कोई पालिश किया हुआ बर्तन था , अधिक इस्तेमाल से जिसकी चमक उड़ गई थी और  वह बदरंग नज़र आने लगा था । भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी जैसी सच्चाइयाँ विकराल रूप में सामने थीं ।
अपने काल्पनिक सुख में डूबी जनता इस सच्चाई को ठीक से समझ नहीं पा रही थी लेकिन इसके बरअक्स वैश्विक राजनीतिक परिस्थतियों को ध्यान में रखने वाले बुद्धिजीवी, कलाकार और संस्कृतिकर्मी इस स्थिति को बेहतर समझ रहे थे । जिसके परिणाम स्वरूप  आज़ादी के दो दशकों बाद कुछ देर से ही सही लेकिन मनोरंजन से भरपूर बम्बैया सिनेमा के समानांतर एक आन्दोलन की समझ के विकास के तहत समानांतर सिनेमा का जन्म हुआ ।
*समानांतर सिनेमा के इस दौर में सत्यजित रे ,मृणाल सेन , मणि कौल , अदूर गोपालकृष्णन , श्याम बेनेगल , गिरीश कर्नाड , गोविन्द निहलानी जैसे फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से रोजगार ,स्वास्थ्य, शिक्षा, नगरीकरण की समस्याओं और समाज की वास्तविकताओं से जनता का परिचय करवाया ।*
इसी के साथ साथ भारतीय जन नाट्य संघ जैसे रंगकर्मियों के संगठन आम जनता के दुःख , पूंजीपतियों द्वारा उनके शोषण और सांप्रदायिकता के मुद्दों को लेकर वामपंथी सोच और प्रतिबद्धता के साथ संस्कृति के मंच पर उपस्थित हुए । एम एस सथ्यु जैसे विचारधारा से लैस निर्देशक भी इन्हीं प्रतिबद्ध लोगों में से एक हैं ।
*अनेक समस्याओं से भरे इस दौर की एक कठिन समस्या थी , भारतीय मुसलमानों का देश की संस्कृति और परिवेश में आत्मसातीकरण ।*
यह बात समझना मुश्किल नहीं था कि इसकी जड़ें विभाजन और उससे पूर्व की ब्रिटिश नीति में थीं । यद्यपि धर्मनिरपेक्ष ताकतों और कौमी एकता में विश्वास रखने वाले तमाम लोगों ने भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द्र का एक खूबसूरत चित्र जनता के सामने प्रस्तुत किया था लेकिन वह चित्र कोरी भावुकता और रूमानियत से भरा था ।
उस समय तक आम हिंदी फिल्मों में मुसलमान पात्र केवल शोभा बढ़ाने के लिए होते थे जबकि फिल्म निर्माण से लेकर संगीत ,गीत लेखन , तकनीक और वितरण तक फिल्म उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में वे जी जान से अपना योगदान दे रहे थे । पार्श्व में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावज़ूद प्रकट में उनका महत्व नगण्य था । वहीँ शिक्षा और अवसरों के अभाव में उनकी सामाजिक स्थिति में भी कोई सुधार नहीं हुआ था । फिल्मकारों के लिए जनता को वास्तविकता का अहसास करवाने के लिए सही इतिहास की ओर लौटना अवश्यम्भावी था लेकिन कोई इस पर गंभीर चिंतन नहीं कर रहा था न कोई इस बात की हिम्मत जुटा पा रहा था अथवा उनमें  गंभीर प्रयासों  की कमी थी ।
*ऐसे कठिन समय में इप्टा से जुड़े युवा निर्देशक एम् एस सथ्यु अपनी फिल्म ‘गर्म हवा’ लेकर आये जो विभाजन की त्रासदी को रूमानी तरीके से न प्रस्तुत करते हुए उन कडवी सच्चाइयों से पर्दा उठा रही थी जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति की खुशियों में भुला दिया गया था ।*
1973 में निर्मित उनकी फिल्म ‘ गर्म हवा ‘ *इस्मत चुगताई* की कहानी पर आधारित है जिसके संवाद मशहूर वामपंथी शायर *कैफ़ी आज़मी* और *शमा ज़ैदी* ने लिखे हैं । यह समय वामपंथी आन्दोलन के उभार का समय था और प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा जैसे संस्कृतिकर्मियों, लेखकों के संगठन आज़ादी के आईने पर जमी धूल को साफ करने में लगे थे ।
*‘गर्म हवा ‘ के निर्देशक एम एस सथ्यु , अभिनेता बलराज साहनी , ए के हंगल ,कैफ़ी आज़मी , युनुस परवेज़ , अबू सिवानी , शौकत आज़मी , दीनानाथ जुत्शी , राजेंद्र रघुवंशी  जैसे वरिष्ठ कलाकारों से लेकर , जलाल आगा , जमाल हाशमी , फारुख शेख ,गीता सिद्धार्थ  और जितेन्द्र  रघुवंशी जैसे युवा कलाकार इप्टा आन्दोलन से जुड़े थे ।*
भारतीय जन नाट्य संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक , कामरेड राजेंद्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेन्द्र रघुवंशी को इस फिल्म में भूमिकाएं मिली थीं । फिल्म पर बहुत विमर्श हुए हैं लेकिन इस फिल्म का एक अनदेखा पक्ष यह रह गया है कि उस दौर में यह फिल्म सत्तर के दशक की युवा पीढ़ी के समस्त कलाकारों और रंगकर्म तथा लेखन से जुड़े विभिन्न संगठनों के लोगों के लिए सामाजिक सच्चाइयों  को जानने और उन्हें परखने की एक कसौटी साबित हुई जिसका दूरगामी प्रभाव भविष्य के सांस्कृतिक आन्दोलन पर पड़ा ।
*इस फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण तात्कालिक प्रभाव यह था कि इसने पूरी एक पीढ़ी को सुला देने वाली मीठी खतरनाक नींद से जगाया ।*
इस फिल्म का समाजशास्त्रीय विश्लेषण और इस पीढ़ी के युवा कलाकारों के जीवन की दिशा तय करने में इस फिल्म की भूमिका पर बात करने से पहले यह आवश्यक है कि इस फिल्म की कहानी का संक्षेप में पुनर्पाठ कर लिया जाए ।
*फ़िल्म का कथानक*
फिल्म के मुख्य पात्र सलीम मिर्ज़ा ( बलराज साहनी ) आगरा में जूते बनाने का व्यवसाय करते हुए शांति पूर्वक जीवन निर्वाह कर रहे होते हैं कि अचानक विभाजन के कुछ माह बाद घटित गाँधी जी की हत्या के बाद स्थितियों में परिवर्तन आ जाता है ।
 उनके बड़े भाई हलीम मिर्ज़ा ( दीनानाथ जुत्शी ) मुस्लिम लीग से जुड़े हैं किन्तु उन्हें अपना भविष्य पाकिस्तान में नज़र  आता है सो वे अपनी पत्नी और बेटे काज़िम  ( जमाल हाशमी ) के साथ पाकिस्तान चले जाते हैं ।
सलीम मिर्ज़ा स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी व्यक्ति हैं जो भारत में अपने भविष्य और सुरक्षा में विश्वास रखते हैं । इस विश्वास को व्यक्त करते हुए , हलीम मिर्ज़ा को ट्रेन से रवाना करने के बाद वे अपने तांगेवाले से कहते हैं कि
*“जो लोग इन मुक़द्दस यादगारों को छोड़कर भाग रहे हैं वे बुजदिल हैं । “*
हलीम मिर्ज़ा के जाने के बाद त्रासदियों का दौर प्रारंभ होता है । हवेली हलीम मिर्ज़ा के नाम पर है सो वह उनकी अनुपस्थिति में सरकार  के द्वारा ‘ ईवेक्यु प्रॉपर्टी ‘ घोषित कर दी जाती है और अजमानी ( ए के हंगल ) नामक एक सिन्धी व्यापारी को सौंप दी जाती है ।
अजमानी बेहद नेकदिल और परोपकारी इन्सान हैं वे जूतों के थोक व्यापारी है और सलीम मिर्ज़ा के कारोबार में उनकी यथासंभव मदद करते हैं । सलीम मिर्ज़ा को विवशतावश अपनी बूढी माँ ( बदर बेगम ) ,पत्नी ( शौकत कैफ़ी ) , बेटे ( फारुख शेख ) और बेटी ( गीता सिद्धार्थ ) सहित अपना पुश्तैनी मकान  छोड़कर किराये के मकान में जाना पड़ता है ।
इधर उनका जूते का कारोबार बन्द होने की कगार पर है लेकिन बैंक और साहूकार भी सलीम मिर्ज़ा को उनके मुसलमान होने की वज़ह से कर्ज नहीं देते , वे इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं वे क़र्ज़ लेकर पाकिस्तान न भाग जाएँ ।
बेटे के पास बी ए की डिग्री है लेकिन मुसलमान होने के कारण उसे भी कहीं नौकरी नहीं मिलती बल्कि नियोक्ताओं द्वारा उसे यह सलाह दी जाती है कि वह पाकिस्तान चले जाए तो बेहतर होगा । वहीं मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति के समानांतर एक प्रेम कथा भी चलती है जिसमें सलीम मिर्ज़ा की बेटी अपने रिश्तदारो यथा तायब्बा और फूफा ( युनुस परवेज़ ) द्वारा विवाह के नाम पर छली जाती है और अंततः निराश होकर आत्महत्या कर लेती है ।
सलीम मिर्ज़ा सब ओर से निराश होने के बाद अंततः पत्नी व बेटे के साथ पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लेते हैं किन्तु स्टेशन जाते हुए रोजी – रोटी व काम के अधिकार को लेकर किए जा रहे आन्दोलनकारियों के एक जुलूस को देखकर उनका बेटा पाकिस्तान जाने का विचार त्याग कर उसमें  शामिल होने चला जाता है ।
*अंततः सलीम मिर्जा को वास्तविकता का भान होता है और वे यह प्रण करते हैं कि “ हमें हिंदुस्तान से भागना नहीं है बल्कि आम आदमी के कंधे से कन्धा मिलकर लड़ना है । “ मैं इस तरह अब अकेले नहीं जी सकता “ कहते हुए वे तांगे से उतर जाते हैं और आशावादी भविष्य की ओर मुड़ने का संकेत देते हुए लाल झंडा उठाये संघर्षरत जनता के जुलूस में शामिल हो जाते हैं ।*
इसे सिर्फ विडम्बना कहना उचित नहीं है कि आज़ादी के बाद से ही लगातार  यही त्रासदी घटित हो रही है । इस घटित होने में केवल धर्मप्राण जनता ही नहीं अपितु सर्व अधिकार प्राप्त सत्ता भी शामिल रही है । नफ़रत वादियों  द्वारा जैसे किसी  षड़यंत्र के तहत इस देश की रग – रग में बस चुकी मुस्लिम जनता को या तो पाकिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है या उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक की तरह उनके धर्म के झंडे तले साँस लेने की मोहलत दी जा रही है । वर्षों से मुसलमानों के बारे में तरह तरह के झूठ फैलाये जा रहे हैं , उनकी विचारधारा और देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाये जा रहे हैं ।
सबसे भयावह स्थिति तो यह है कि कुछ सिरफिरे आतंकवादियों का उनके धर्म का होने और आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण  समस्त कौम को आतंकवादी घोषित किया जा रहा है ।
इस दौर में जब मुस्लिम देशों में भी आतंकवादी गतिविधियाँ  घटित हो रही हैं और आतंकवादी अपने ही धर्म के लोगों को मार रहे हैं और यह तय हो चुका है कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता धर्म के नाम पर किसी को सरासर आतंकवादी कह देना किस नीति के तहत है ? उनकी जीवन शैली , व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता , इतिहास और स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके योगदान आदि को लेकर भी सवाल क्यों खड़े किये जा रहे हैं ?
इस परिप्रेक्ष्य में एक बार पुनः हम ‘ गर्म हवा ‘ के देश काल और परिवेश का अवलोकन करते हैं । यह बात हम भलीभांति जानते हैं कि आज़ादी के बाद के दौर में साम्प्रदायिकता सम्बन्धी भावनाएं तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य की अलगाव वादी नीतियों से प्रेरित थीं । आम जनता अपने धर्म और अपनी असुरक्षा को लेकर इतनी आत्मकेंद्रित हो चुकी थी कि हर ग़ैर धर्म के व्यक्ति को संदेह की नज़र से देखा जाता था । ‘गर्म हवा ‘ में सलीम मिर्ज़ा द्वारा हवेली का नक्शा अपने बड़े भाई हलीम मिर्ज़ा को पाकिस्तान भेजने पर उन पर जासूसी का आरोप लगाया जाता है और उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है । समाज द्वारा भी उन्हें अपमानित किया जाता है ।
यह स्थिति तत्कालीन शासकों की संवेदनशीलता ,राजनीतिक इच्छाशक्ति और अन्य धर्मों के प्रति उनकी विचारधारा पर प्रश्नचिन्ह लगाती है । स्थितियां उससे ज्यादा बदतर होती गईं, आस्था और विश्वास अब अपने ही धर्म के लोगों के प्रति भी नहीं है , गैर धर्म की तो बात ही बेमानी है जबकि  ‘गर्म हवा’ उस दौर में बनी थी जब आज़ादी की रजत जयंती मनाई जा रही थी और स्थितियां उस समय तक उतनी ज्यादा ख़राब नहीं हुई थीं  इसीलिए यह उन पच्चीस बरसों के कालखंड पर पैनी नज़र रखते हुए सांप्रदायिक सौहार्द्र को लेकर एक आशावादी भविष्य की ओर संकेत करती है और इसका अंत एक उम्मीद की किरण पैदा करता है ।
लेकिन इसके बाद हम देखते हैं कि आज़ादी की स्वर्ण जयंती तक आते आते स्थितियां बहुत बदल चुकी होती हैं और आज की वास्तविकता तो यह है कि अब वह आशा धीरे धीरे निराशा में बदलती जा रही है ।
*‘गर्म हवा’ के माध्यम से हम फिल्म निर्माण के समय की सांस्कृतिक स्थितियों पर भी एक नज़र डालते हैं । कला की विभिन्न विधाएं यथा कविता, कहानी , नाटक ,चित्रकला , फिल्म इत्यादि ऐसे माध्यम हैं जो जनता की विचारधारा के निर्माण में महत्वपूर्ण  भूमिका अदा करते हैं ।*
यह समाज के विभिन्न घटकों के आपसी तालमेल ,उन के बीच भाईचारा और सौहार्द्रपूर्ण स्थितियों के निर्माण के अलावा जनता की राजनीतिक समझ विकसित करने का कार्य भी करते हैं ।
 *‘गर्म हवा’ में यह बात शिद्दत से रेखांकित की गई है कि इस देश में रहने वाले एक आम मुसलमान को भी उसी तरह रोजी रोटी पाने का हक़ है जैसे कि एक हिन्दू या अन्य धर्मावलम्बी को है । इसी तरह यह उन्हें उनके कर्तव्य के प्रति भी आगाह करती है ।*
कमोबेश यही स्थिति फिल्म के अंत में सलीम मिर्ज़ा और उनके बेटे को आन्दोलन में शामिल होने को प्रेरित करती है वहीँ वे एक दृश्य में  एक राजनैतिक पार्टी के स्वार्थी और अवसरवादी नेताओं द्वारा किये जा रहे छद्म आन्दोलन में शामिल न होकर अपना विरोध भी प्रकट करते हैं ।
आठवें  दशक में ‘गर्म हवा’  के अतिरिक्त और उसके आसपास समानांतर सिनेमा ने कुछ और फ़िल्में भी दीं जिन्होंने उस दौर की जनता की राजनीतिक समझ विकसित करने में अपना योगदान दिया । इस वर्ग में हम श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फिल्मों को रख सकते हैं । यद्यपि बहुसंख्य जनता ने फिल्म के उद्देश्य विचारधारा के निर्माण की बजाय  मनोरंजन को ही चुना और इलीट वर्ग में सराही जाने के बावजूद आम लोगों में यह फ़िल्में लोकप्रिय नहीं हो पाई , फलस्वरूप धर्म को लेकर अनेक विसंगतियों का समाज में जन्म हुआ ,अन्य धर्मावलम्बियों की देशभक्ति , उनके स्वाभिमान और देश की मुख्यधारा में रच बस जाने के उनके प्रयास को महत्व नहीं दिया गया बल्कि एक सोची समझी चाल के तहत अलगाव वादी नीति अपनाते हुए उन्हें हमेशा पराया ही समझा गया ।
धर्म के आधार पर विभाजित इस देश की इस से बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि  इस फिल्म ‘गर्म हवा’ के निर्माण के चालीस वर्षों बाद भी निर्देशक एम एस सथ्यु को इस बात के लिए अफ़सोस प्रकट करना पड़ रहा है कि भारतीय हिंदी फिल्मों ने अपने उस दायित्व का निर्वाह नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था , कुछ वर्ष पूर्व भिलाई में आयोजित एक फिल्म समारोह में एम् एस सथ्यु ने  ‘गर्म हवा ‘ के प्रदर्शन के बाद फिल्मों  की इस कमज़ोरी  की ओर संकेत करते हुए बहुत दुःख के साथ कहा था कि *“ यह विडम्बना ही है कि  आज भी हमारे देश की फिल्मों में एक मुसलमान को आम आदमी की तरह नहीं बताया जाता , उसे या तो स्कूटर ,मोटर मैकेनिक बताया जाता है या शायर नुमा कोई व्यक्ति और बहुत हुआ तो कोई नवाब । “*
इस फिल्म के परिप्रेक्ष्य में हम देखते हैं कि आज़ादी के सडसठ सालों बाद आज स्थितियां और अधिक भयावह हुई हैं । सलीम मिर्ज़ा का मुसलमान होना उन्हें किराये का मकान मिलने में बाधक होता है वहीँ आज भी ऐसे अनेक पढ़े-लिखे नौकरीपेशा मुसलमान हैं जिन्हें किसी नए शहर में किराये का मकान ढूँढने के लिए दर दर भटकना पड़ता है । अच्छे अच्छे प्रगतिशील भी यह नहीं चाहते की कोई मुसलमान उनका किरायेदार बने । यहाँ तक कि कुछ लोग यह भी नहीं चाहते कि जिस टैक्सी में वे यात्रा कर रहे हैं उनका ड्राईवर मुसलमान हो ।
यद्यपि सरकारी और सार्वजानिक क्षेत्रों की नौकरी में धर्म आड़े नहीं आता लेकिन प्राइवेट संस्थानों में आज भी उनके साथ पक्षपात किया जाता है । इस प्रश्न को केवल लोगों की संकुचित मानसिकता कह कर टाला नहीं जा सकता , इसकी पृष्ठभूमि में अनेक तरह की सत्ता सापेक्ष समाज विरोधी नीतियां हैं ।
अंत में फिल्म ‘गर्म हवा’ के एक और महत्वपूर्ण पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ जिसे एक सम्पूर्ण पीढ़ी द्वारा किये गए कला आन्दोलन के पक्ष में रेखांकित किया जाना  आवश्यक है ।
 ‘गर्म हवा’ फिल्म 1973 के दौर में एक सांस्कृतिक क्रांति की तरह आई थी । इस फिल्म में प्रस्तुत विषय के कारण इस के निर्माण के बाद इसके प्रदर्शन में भी इनेक बाधाएं उत्पन्न हुईं । सांप्रदायिक शांति में व्यवधान उत्पन्न होने की सम्भावना का आरोप लगाकर इस फिल्म के प्रदर्शन को आठ माह तक रोका गया , तत्पश्चात बोर्ड के सदस्यों को फिल्म दिखाने के बाद बैंगलोर के दो सिनेमाघरों में इसका प्रदर्शन हुआ । इसका प्रभाव देखने के बाद अप्रेल 1974 में मुंबई के रीगल सिनेमा में इसका प्रदर्शन हुआ
*यद्यपि  इसके प्रदर्शन से पूर्व यह कहते हुए कि यह फिल्म मुसलमानों के पक्ष में है तत्कालीन शिवसेना प्रमुख ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की परंतु फिल्म देखने के बाद व इस बात पर सहमत हुए कि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो भारत विरोधी हो l*
 उसके बाद ‘गर्म हवा’ का देशव्यापी प्रदर्शन हुआ और अब तो इस फिल्म का डिजिटल स्वरूप भी उपलब्ध है । इस फिल्म का सकारात्मक पक्ष यह भी रहा कि इस फिल्म से उस दौर के समानांतर सिनेमा की क्रांतिकारी  शुरुआत हुई  l एम् एस सथ्यु स्वयं इप्टा से जुड़े थे इसलिए फिल्म में दिल्ली , मुंबई व आगरा के अनेक इप्टा के कलाकारों को विभिन्न भूमिकाएँ दी गईं l बलराज साहनी के जीवन की यह अंतिम फिल्म थी वहीँ फारुख शेख ,जितेन्द्र  रघुवंशी जैसे कलाकारों की शुरूआती फिल्म l जितेन्द्र  रघुवंशी इस फिल्म में आन्दोलनकारी युवा बेरोजगारों की टीम में शामिल थे और ऐसे कलाकारों को उस समय फिल्म की भाषा में एक्स्ट्रा कहा जाता था l इस फिल्म से शुरुआत कर वे मुंबई फिल्म जगत में एक बेहतर स्थिति बना सकते थे लेकिन उन्होंने विचारधारा पर आधारित रंगमंच को प्रमुख स्थान दिया और इप्टा के सांगठनिक मोर्चे पर अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह किया l इस फिल्म में उनके साथ युवा बेरोजगारों की टीम में उनके भाई शैलेन्द्र रघुवंशी और उनके मित्र दिनेश सन्यासी , दलजीत सिंह , दीपक कपूर आदि भी शामिल थे l यह समस्त कलाकार इस फिल्म के माध्यम से प्रेरित हुए और उन्होंने फ़िल्मी दुनिया के ग्लैमर की बजाय  विचारधारा और प्रतिबद्धता का मार्ग चुना l
दिवंगत फारुक शेख, दिवंगत जितेन्द्र रघुवंशी की यह पूरी पीढ़ी आज लगभग वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में पहुँच चुकी है लेकिन अब भी यह पीढ़ी चुकी नहीं है l इस पीढ़ी में तमाम वरिष्ठ बुद्धिजीवी , लेखक , सांगठनिक मोर्चों पर शीर्षस्थ भूमिका निभाने वाले जन आन्दोलनों के नेता शामिल हैं l इन तमाम लोगों की मानसिक पृष्ठभूमि की बनावट में इस फिल्म का महत्वपूर्ण योगदान है l अब उनके सामने साम्प्रदायिकता के अलावा राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र में भी नई चुनौतियाँ हैं l इन्होंने सपनों की नींव रखने ,उनके फलीभूत होने से लेकर स्वप्नभंग होने तक का दौर अपनी आँखों से देखा है l इस पीढी ने फिल्म प्रदर्शन के बाद की स्थितियों के अंतर्गत इमरजेंसी, सत्ता परिवर्तन , बाबरी विध्वंस सहित अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर सोवियत संघ का विघटन अमेरिका और पूर्व के मुस्लिम देशों की राजनैतिक स्थितियां , अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और अन्य राजनैतिक आर्थिक सामाजिक क्षेत्रों में भी अनेक उतार चढ़ाव  देखे हैं, कई सत्ताओं को बनते – बिगड़ते देखा है l आज भी इस पीढी के लोग उस गर्म हवा के खिलाफ लड़ रहे हैं जिसके लिए बलराज साहनी ने फिल्म के शुरूआती दृश्य में कहा था *“कैसे बड़े बड़े दरख्त कट रहे हैं ..इस गर्म हवा में .. जो उखड़ा नहीं वो सूख जाएगा l*
ग़नीमत है कि इस पीढी के लोग वैमनस्यता , प्रतिद्वंद्विता , आतंकवाद ,अलगाववाद , शोषण , दमन , की गर्म हवाओं का डटकर मुकाबला कर रहे हैं और अभी तक उखड़े नहीं हैं l वे सूखे भी नहीं हैं बल्कि जनपक्षधरता और दर्शन की समझ से सिंचित अपनी जड़ों में शामिल विचार की आर्द्रता से आने वाली पीढ़ियों को समृद्ध करते हुए उनके फलने फूलने में मदद कर रहे हैं l
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