संत कवि दादू :: डॉ. श्रीरंग शाही

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( डाॅ श्रीरंग शाही की पुण्यतिथि 25 सितंबर पर विशेष –  उनके द्वारा लिखित आलेख संत कवि दादू)

संत कवि दादू

  • डाॅ श्रीरंग शाही

दादू दयाल सर्वात्मवाद के प्रवर्तक और प्रतिपादक सन्त थे। दादू को लय योगी भी माना जाता है ।भारतीय संस्कृति की उदारता- क्षमाशीलता के  पृष्ठ पोषक ,समग्र मानवता में एकता के सूत्र संचालक, सद्भाव,सेवा दयालुता के प्रतीक पुरुष संत साहित्य के संरक्षक, सरल स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अप्रतिम संत श्री दादू दयाल जी का जन्म फागुन शुक्ल  सं  1601 को गुरुवार के दिन गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद नगर में हुआ था। दादू दयाल जी के पिता लोदी रामजी नागर ब्राह्मण थे। दादू पंथियों का विश्वास है कि दादू दयाल एक छोटे से बालक के रूप में साबरमती नदी में बहते हुए लोदी राम जी को मिले थे ।कुछ विद्वानों का कहना है कि दादू जी लोदी राम जी के औरस पुत्र थे। आपकी माता बंसी बाई ब्राह्मणी थी ।कुछ विद्वानों का कहना है कि दादू धुनिया मुसलमान थे। इनका कहना था कि दादू का पहला नाम दाऊद था, जो कालांतर में दादू बन गया। दादूपंथी प्रसिद्ध कवि रज्जब की मान्यता है कि दादू धुनिया थे। आचार्य क्षिति मोहन सेन ने अपनी पुस्तक संस्कृति संगम में दादू के गुरु का नाम वृद्धानंद या  वुइठन कहा है ।सुंदर दास जी ने भी अपनी रचनाओं में दादू के गुरु के रूप में वुइठन को ही माना है। दादू जी ने कहा भी था-

सांचा समरथ गुरु मिला ,तिन तत दिया बताए

दादू मोट महाबली सब घृत मथ कर खाए

दादू निर्गुण संतमत के स्तंभों में एक थे। उन्होंने एक पंथ विशेष की स्थापना की थी ,जिसे पर ब्रम्ह  संप्रदाय “ब्रह्म संप्रदाय एवं दादू पंथ “भी कहते हैं। पंडित सुधाकर द्विवेदी और ग्रियर्सन ने दादू को जौनपुर निवासी और मोची माना है ।चंद्रिका प्रसाद जी ने दादू दयाल की वाणी का संपादन किया है और उन्होंने दादू का जन्म विक्रम 1601 माना है ।अकबर कालीन प्रसिद्ध इतिहासकार मुहसन फनी और विल्सन एवं तारा दत्त ने दादू को धुनियाँ माना है ।क्षिति मोहन सेन जी ने भी आपको मुसलमान ही माना है। साहित्य अकादमी के द्वारा दादू दयाल पर एक पुस्तक का प्रकाशन हुआ है और इसके संपादक श्री राम वदन हैं। राम वदन जी की भी मान्यता है कि दादू का जन्म संवत् 1601  (1544 )और उनकी मृत्यु जेष्ठ  वदी (कृष्ण पक्ष )अष्टमी शनिवार संवत 1660 (सन1603 )को हुई थी।

इस प्रकार दादू का जन्म, मृत्यु ,जीवन ,व्यक्तित्व, किंवदंतियों, अफवाहों और कपोल कल्पनाओं से ढका हुआ है ।संत कवि  दादू दयाल की रचनाएं लोक चेतना का अंग बनकर सामूहिक स्मृति में जीवित रही हैं। दादू कबीर की परंपरा के संत कवि थे ।उनकी रचनाओं में कबीर की सी  प्रखरता और तेजस्विता नहीं है। दादू बड़े शांतचित्त और विनम्र भाव के संत थे। आपकी कविता समगति से चलती है ।आपकी कविताओं में उतार-चढ़ाव नहीं है। दादू जी ने हिंदू मुस्लिम वैमनस्य और छुआछूत का विरोध करके सामाजिक जीवन में उदारता का परिचय दिया था।

नागरी प्रचारिणी सभा ने आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के संपादकतत्व में दादू दयाल ग्रंथावली का प्रकाशन किया है। दादू दयाल की 2453 सखियाँ हैं और 426 पदों की रचना दादू ने की थी ।डाॅ नामवर सिंह ने दूसरी परंपरा की खोज नाम की पुस्तक में दादू की  चर्चा की है।

डाॅ रामविलास शर्मा ने परंपरा का मूल्यांकन में भी दादू का सादर स्मरण किया है ।दादू निर्गुण संत थे अतः बौद्ध दर्शन और गोरखनाथ से भी प्रभावित थे। गोरखनाथ ने कहा था –

गृहे गृहे पुस्तक मारा- मारा, पूरे पूरे पंडित यूथ-यूथा

वने वने तापस वृंद- वृंदा  न ब्रम्ह वेता  न च कर्म कर्ता

दादू जी ने कहा-

दादू पाती प्रेम की विरला बाँचे कोय

वेद पुराण पुस्तक पढ़े प्रेम बिना क्या होए

 

पढ़ि-पढ़ि थाके पंडिता,किनहूँ न पाया पार

कथि कथि थाके मुनि जन, दादू नाम आधार

 

कागद काले करि मुए ,केते वेद पुराण

एकै  आखर पीव कर ,दादू पढ़े सुजान

 

कबीर की तरह दादू का भी कहना था कि परमात्मा आत्मा में निवास करती है। कबीर ने कहा था

तेरा साईं तुझ में जो पुहपन में वास

कस्तूरी का मिरग ज्यों फिरि फिरि ढूंढै घास

 

दादू जी ने कहा-

कोई दौड़े द्वारिका कोई काशी जाहि

कोई मथुरा को चलै साहिब घट ही  माँहि

 

महादेवी जी ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा था –

क्या पूजा क्या अर्चन रे

उस असीम का सुंदर मंदिर

मेरा लघुतम जीवन रे

दादू का परम साध्य निराकर निरंजन परम पुरुष अलख अगोचर ब्रम्ह है ।वह अति सूक्ष्म है ।उपनिषद के ब्रह्म की तरह दादू का ब्रह्म भी अज्ञात है ।

मिट्टी महल बारक है ,गाऊन ,ठाऊन, नाऊँ

तासो  मन लागा रहे ,मैं बलिहारी जाऊँ

दादू ने रामानुज की तरह जीवात्मा का परमात्मा का अंश स्वीकार किया है ।रविदास ने भी ऐसा ही माना था।

” काया अंतरि पाइया, त्रिपुरा त्रिकुटी केरे तीर

सहजे आप लबाइया व्याप्या सकल शरीर ”

दादू ने संसार को झूठा प्रमाणित  किया था ।मनुष्य इस झूठे संसार में अपना जीवन व्यर्थ ही नष्ट करता है।

दादू झूठा संसार  झूठा परिवार झूठा घर वार

 

दादू ने भी गुरु की वंदना की है। गुरु की कृपा से बहरा भी सुनने लगता  है ।

दादू सतगुरु अंजन बहि करि नैन पटल सब घोले

बहरे कानो सुनने लागे गूंगे मुख सो बोले

 

दादू दयाल की रचनाओं की संख्या भी अनिश्चित है। क्षिति मोहन  सेन का कहना  है कि इनके पदों की संख्या 20,000 से अधिक है ।परशुराम चतुर्वेदी का संकलन दादू दयाल ग्रंथावली प्रमाणिक है।चतुर्वेदी जी ने दादू की सखियों को 36 अंगों में विभाजित किया है ।चतुर्वेदी जी के अनुसार 2453 शक्तियां और 426 पदों की रचना दादू ने की थी।

दादू की साधना अद्वैतवादी थी। उनका कहना था –

सदालीन आनंद में सहज रूप सब ठौर

दादू देखे एक को दूजा नाहीं और

 

रज्जब साहब ने अंग बधू नाम से दादू के पदों का संकलन किया था ।

दादू जी का कहना था कि जब तक मन स्थिर नहीं होता तब तक साधक की साध्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। मन हाथी के समान है ,जो मस्ती में बहता ही जाता है। मन को घट में ही घेरना पड़ता है ।

दादू यहु मन बरजी बावरे घट में रखो फेरे

मन हस्ती माता बहै अंकुश दे दे फेरि

दादू जी विवाहित थे और उन्हें दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं ।दादू जी का परम पद प्रयाण नारायण नामक स्थान में 1660 विक्रम में हुआ था। दादूजी प्रकृति से भ्रमणशील प्राणी  थे और आपने बिहार और बंगाल का भ्रमण किया था ।बंगाल के बाहुलों में दादू के प्रति श्रद्धा का एक विशेष भाव उनकी वंदना में मिलती है ।कहा जाता है कि संवत 1632 में दादू जी को प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इनके प्रथम पुत्र का नाम गरीबदास था ।दूसरे पुत्र का नाम मिस्कीन दास रखा गया ।कहा जाता है कि अकबर ने दादू से मिलने की इच्छा प्रकट की थी और 1643 में दादू  फतेहपुर सिकरी  गये थे ।दादू  जी को गहन अनुभूति का परम  साक्षात्कार हो चुका था।

कबीर की सहज अवस्था दादू को भी प्राप्त हो गई थी ।इस मार्ग को दादू ने सहज मार्ग कहा था। दादू का उद्देश्य एकमात्र निरंजन निराकार ब्रह्म की सत्ता का अनुभव करना ही था। अहिंसा, सत्य ,अस्तेय ,शांति,अपरिग्रह और वैराग्य  तितिक्षा, क्षमा, दया, समानता ,निराभिमानता आदि सद्गुणों के प्रति हेतु दादू ने साधना की थी ।दादू के शिष्य संत दास और जगन्नाथ दास ने हरडे वाणी के नाम से दादू की वाणियों का संग्रह किया था। दादू ने भी जीवन को अनित्य माना है ।कबीर ने कहा था कि-

हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास

दादू ने भी कहा था

कागारे करक परि  बोले खाई मांस अरू लग ही डोले

जातन कौले अधिक संवारा सों तन लो माटी में डारा

डाॅ रविंद्र कुमार सिंह ने दादू  की सामाजिक प्रसांगिकता नाम की पुस्तक में दादू को  संत साहित्य का शीर्ष कवि माना है और दादू को कबीर का अनुयायी माना है। डॉक्टर कृष्ण बल्लभ दुबे ने संत कवि दादू नाम शोध प्रबंध में दादू की चेतना पर सविस्तार विचार किया है। डॉ विवेकी राय जी ने भी आस्था और सर्जन और पवहारी बाबा नाम की पुस्तकों में दादू की चर्चा संत साहित्य के विश्लेषण के क्रम में की है ।डॉ पितांबर दत्त वड़श्वाल ने संत साहित्य पर सविस्तार विचार किया है और अपनी पुस्तक गोरख वानी में संत साहित्य का विकास दिखलाया  है ।दादू जी ने जीवन को ही अनित्य माना था ।उनका कहना था अंतिम सच मौत है।

राव रंक सब मरहिंगे जीवै नाही कोय

दादू सोई जीवता जो मर जीवा  होइ

मौत की अनिवार्यता वर्णन करने के साथ  दादू ने बुढ़ापे का वर्णन भी किया है। उनका कहना है कि एक दिन बुढ़ापा आएगा और यौवन चला जाएगा।

मनि रे अंति काल दिन आया, ताथै बहु सब भया पराया

दिन दिन काल गरासै  जीयरा दादू चेते नाहीं

दादू काव्य के अवगाहन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि दादू की वाणी की एकरसता उनकी मानसिक स्थिरता से आई है ।विरोध , अपमान  हंसी, खुशी के बावजूद दादू में यदि कहीं बेचैनी है तो भीतर ही है। उनकी भाषा में यह बेचैनी प्रकट नहीं होती है। दादू की वाणी ने पीड़ित प्रताड़ित जनता को जीवनी शक्ति प्रदान की है ।गोरखनाथ की बातें कबीर वाणी में और कबीर के विचारों की गूंज दादू वाणी में सुनाई पड़ती है ।

मैं कह सकता हूं कि दादू आदि संतों ने हमारे देश के पद दलित और अनपढ़जनों को सांस्कृतिक नेतृत्व प्रदान किया और उनके अनुभवों को वाणी दी थी ।संतों की  यह प्रगतिशील भूमिका थी। दादू ने निंदा स्तुति को समभाव से ग्रहण किया था ।उन्होंने विरोधियों से बहस नहीं की थी किंतु, समर्थकों को उपदेश भी दिया था ।आज भी दादू उतने ही  प्रासंगिक हैं।

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परिचय : स्मृतिशेष लेखक डॉ श्रीरंग शाही हिंदी और बज्जिका के साधक साहित्यकार रहे हैं. इन्होंने कई किताबें लिखीं और कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया.

 

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