ख़ास कलम :: मधुकर वनमाली

बरसाणे की बावरी बरसाणे की बावरी,राधा सुंदर नाम। धवल सरीखी दूध जो,मीत मिला घनश्याम।। वनमाली यह सोचते,अलग हुआ जो रंग। हंस मिले ज्यों काग से, नहीं जँचेगा संग।। मैया जसुमति…

खास कलम :: अभय शर्मा

तुम्हें मेरा नाम याद आ जाये मैं तुझसे बात  नहीं  करता इसका  मतलब यह  नहीं  कि तुम्हें याद नही करता.. सोचता हूँ कि अब तक तुम्हें  मेरा पूरा  नाम याद…

खास कलम:: रेखा दूबे

 मां –  रेखा दुबे कितना सुंदर रूप तुम्हारा जैसे गंगा जल की धारा , शान्त , शाश्वत ,रूप बेल सा कर्तव्यनिष्ठा से,परिपूरित था, हम ढूंढ रहे थे,तिनका-तिनका माँ रूप तुम्हारा…

खास कलम :: रिजवान इकरा

अब इन्तज़ार के मौसम उदास करते नहीं, अजीब है कि हमें ग़म उदास करते नहीं। कभी-कभी का ख़फ़ा होना ठीक है लेकिन, किसी के दिल को यूँ पैहम उदास करते…

खास कलम :: विनय

सृजन भ्रम बुझी-बुझी आँखों और ऐंठती अँतड़ियों को जब गटक जाता है भूख का प्रचंड दानव तो हमारी बर्फ हो चुकी संवेदना पिघल-पिघल कर बिखेरने लगती है कागज की सुफेद…