विशिष्ट गीतकार :: अनामिका सिंह

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अनामिका सिंह के दस गीत
शाम सबेरे शगुन मनाती 
शाम सबेरे शगुन मनाती
खुशियों की परछाई
अम्मा की सुधि आई ।
बड़े सिदौसे उठी बुहारे
कचरा कोने – कोने
पलक झपकते भर देती
थी  नित्य भूख के दोने
जिसने बचे खुचे से अक्सर
अपनी भूख मिटाई
अम्मा की सुधि आई ।
तुलसी चौरे पर मंगल के
रोज चढ़ाए लोटे
चढ़ बैठीं जा उसकी खुशियाँ
जाने किस परकोटे
किया गौर कब आँखों में थी
जमी पीर की काई
अम्मा की सुधि आई ।
पूस कटा जो बुने रात-दिन
दो हाथों ने फंदे
आठ पहर हर बोझ उठाया
थके नहीं वो कंधे
एक इकाई ने कुनबे की
जोड़े रखी दहाई
अम्मा की सुधि आई ।
बाँधे रखती थी कोंछे हर
समाधान की चाबी
बनी रही उसके होने से
बाखर द्वार नवाबी
अपढ़ बाँचती मौन पढ़ी थी
जाने कौन पढ़ाई
अम्मा की सुधि आई ।
 दस्तारों की डाह
अनुसंधान चरित पर तेरे
होंगे विकट गहन
सधी चाल से तय रस्ते पर
चलता जा  रे मन ।
तुझे बहा ले जाने लहरें
आएँगी वाचाल
चाहेंगे बदचलनी अंधड़
उखड़ें संयम पाल
अवरोधों के विशद अँधेरे
होंगे और सघन
गतिविधियों पर लोग रखेंगे
टेढ़ी तिरछी आँख
नहीं हटेंगे पीछे यदि जो
पड़े काटने पाँख
नहीं चौंकना सँभव है वे
निकलें अगर स्वजन
सदियों से माना बेहद है
ऊबड़ – खाबड़ राह
रही मुखरता की प्रतिद्वन्दी
दस्तारों की डाह
घुटने टेकेगा दृढ़ता पर
सम्मुख मान दमन ।
खोदना है रेत में गहरा कुआँ
दूर. तक छाया नहीं है , धूप है
पाँव नंगे राह में कीले गड़े
लोक हित चिंतन बना
साधन हमें
खोदना है रेत में
गहरा कुआँ
सप्तरंगी स्वप्न देखे
आँख हर
दूर तक फैला
कलुषता का धुआँ
कर रहे पाखण्ड
प्रतिनिधि बैर के
हैं ढहाने दुर्ग
सदियों के गढ़े
रूढ़ियों की  बेड़ियाँ
मजबूत हैं
भेड़ बनकर
अनुकरण करते रहे
स्वर उठे कब  हैं
कड़े प्रतिरोध के
जो उठे असमय वही
मरते रहे
सोच पीढ़ी की
हुई है भोथरी
तर्क , चिंतन में
हुए पीछे खड़े
हो सतह समतल
सभी के ही लिए
भेद न हो , वर्ग में
अब न बँटें
खोज लें समरस
सभी निष्पत्तियाँ
शाख रूखों से नहीं
ऐसे छँटें
काट दें नाखून
घातक सोच के ,
चुभ रहे सद्भाव के
बेढब बढ़े ।
आग लगा दी पानी में
रामराज की जय हो जय हो
आग लगा दी पानी में
मंदिर और शिवाले वाले
बुत के गढ़े कसीदे ।
अखिल विश्व की सत्ता,
ने ही मूँद लिए हैं दीदे
फिर कोई जोखू बन आया
असलम दुःखद कहानी में
ठकुरसुहाती करें चौधरी
डाल बुद्धि पर ताला
लगा विवेकी चिंतन में है
जातिवाद का जाला ।
घायल बचपन हुआ,बिलोते
कट्टर धर्म मथानी में ।
अनाचार की विषबेलों ने
जहर हवा में घोला
पाखण्डी चेले करते हैं
रोज रोज ही रोला
न्याय तुला भी नहीं उड़ेले
पानी चढ़ी जवानी में
परस तुम्हारा जादू टोना
छू मंतर हो गई उदासी
एक तुम्हारे आ जाने से ।
संवादों ने मन सहलाया
जो था तुम बिन निपट अलोना
सम्मोहन ने मूँदीं पलकें
परस तुम्हारा जादू टोना
बात बढ़ाई मन मनबढ़ ने
हौले टिके -टिके शाने से ।
गंध हवा की लहकी-बहकी
और तुम्हारा नेह निमंत्रण
इस ठीहे आ टूटे औचक
बरसों बरस निभाये जो प्रण
चाहत ने अनुबंध भरे फिर
लाज-शरम के तहखाने से ।
कौन रेह से धुल सकता है
रंग प्रेम का ऐसा चोखा
बिन वादों का बिन कसमों का
एक कथानक बिल्कुल ओखा
तुम मेरे फिर क्या मिलना है
दुनिया के खोने-पाने से ।
मौन रहना हम सभी का 
मौन रहना हम सभी का
अब भयानक है ।
न्याय की पलटी तराजू
सत्य की हँस डाँड़ मारे
वंचितों का स्वर बने वो
दण्ड के  खोले किवारे
न्याय के अन्याय से कब
सच गया छक है ।
बाँटते संकेत पर भय
तान बन्दूकें दरोगा।
और शंका की निगाहें
खोजती हैं श्याम चोगा
कोई  भी उम्मीद इनसे
झूठ नाहक है ।
डंक जहरीले चुभातीं
नव पनपती आस्थाएँ।
और पुजती जा रहीं हैं
मुँह सिले फिर भी शिलाएँ ।
आग है, धर्मांधता के हाथ
चक़मक है ।
गूँजते हैं तालियों की
गूँजते हैं
तालियों की,
थाप के शुभ स्वर ।
हर सगुन के
काज आये
द्वार पर किन्नर ।
सगुन के गीत गाते ,
दें
बधाई लो बधाई ।
ब्याह,गौने ,जच्चगी में
नाचते
छम छम ।
नयन रंजन कर रहे
जन ,
देख तन के खम ।
जिए लल्ला जिए जच्चा,
दुआएँ दे रहे माई।
बोलते ,
लगते बहुत बरजोर
हैं सारे ।
चल रहे
लचका कमर नर
देह से हारे ।
हिकारत से
गये देखे
सहे हर साँस रुसवाई ।
मारता कहकर
शिखंडी
जग इन्हें ताना ।
कौन है
हम-आप में
इंसान जो माना ।
उद्धारकों की
आँख की
छँटती नहीं काई ।
जी रहे जीवन
कटी ,
सबसे अलग धारा ।
दर्द  है अनकथ
हुई , ऐसी
इन्हें कारा।
सहारा नेग का केवल
नाचकर ,
जोड़नी पाई ।
विकट अमंगल है
बारूदी चल रही हवायें
विकट अमंगल है ।
वहशीपन ने काट दिये हैं
बचपन के कन्ने ।
धुआँ -धुआँ हो गये किताबों
के अपठित पन्ने ।
मानवता की खोज व्यर्थ ,
धँस गयी रसातल है ।
जंग छेड़कर बोलो आखिर
क्या हासिल होना ।
सदियों तक परिणाम पड़ेगा
पीढ़ी को ढोना ।
किसी समस्या का आखिर
कब जंग हुई हल है ।
बारूदी उन्माद भयावह
गया नहीं टाला ।
इनका-उनका , सबका तय है
होना मुँह काला ।
शाखों पर पंछी आकुल
दहशत में जंगल है ।
कैसे बाँधू मन
एक तुम्हारा साथ सलोना
उस पर ये अगहन ।
कैसे बाँधूँ मन ।
कुहरा -कुहरा हुईं
दिशाएँ
मौसम छंद गढ़े ।
ढाई आखर बाँच
बावरे मन का
ताप बढ़े ।
तोड़ रही है तंद्रा बेसुध
चूड़ी की खन-खन
कैसे बाँधूँ मन ।
परस मखमली धड़कन दिल की
रह -रह बढ़ा रहा ।
श्वासों की आवाजाही में
संयम आज ढहा ।
हौले से माथे जब टाँका
है अनमोल रतन
कैसे बाँधूँ मन ।
अधरों का उपवास तोड़कर
पल में सदी जिये ।
रंग धनुक से अंतर्मन में
रिलमिल घोल दिये ।
हुआ पलाशी अमलतास – सा
पियराया आनन
कैसे बाँधूँ मन ।
शीत ने पारा जमाया 
पूस लेकर धुंध आया
साथ अपने
शीत  ने पारा जमाया ।
दुबक बैठा कोटरों में
त्रस्त खगकुल
पंख मोड़े ।
पसर कुहरा हर दिशा में
रश्मियों का
दंभ तोड़े ।
शीत ने प्रस्ताव
पारित कर गलन के
धूप को हाँका लगाया ।
भूख ने कर दी मुनादी
झोपड़ी की
आँत सिकुड़ी ।
रोटियों का स्वप्न कच्चा
टूटने पर
आँख निचुड़ी ।
फिर सुबह अखबार में
हाकिम कहेंगे
देश है अफरा अघाया ।
साग बथुआ
गुड़ गजक का
स्वाद मुँह में लगा घुलने।
टोपियों,मफलर रजाई
के लगे
सन्दूक खुलने ।
नेह ने फंदे कसे
उनसे लिपटकर
देह ने फिर
ताप पाया ।
भा रहे कुछ को मगर
कुछ के लिये
ये दिन कड़े हैं ।
हैं इकाई एक लेकिन
वस्तुतः
ये दो धड़े हैं।
एक मौसम ने धरा के
मंच पर क्यों
दो तरह का राग गाया ।
…………………………………………………………………
परिचय :   अनामिका सिंह  के गीत की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं.  वागर्थ ( नवगीत पर एकाग्र साहित्यिक समूह ) का इन्होंने संपादन भी किया है.
संप्रति -शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत
संपर्क :: स्टेशन  रोड, गणेश नगर, शिकोहाबाद- जिला -फिरोजाबाद (283135)
सम्पर्क सूत्र-9639700081
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