पुनरावृति

एक दुसरे के एहसासों से लदे
हम लौट आते हैं हर बार
एक दुसरे के पास
पहले से लड़ी बड़ी लडाइयों के बावजूद
कई दिनों की मुह फुलाई
के अल्प विराम के बाद
कुछ समझौता कुछ संधियों में
लिए वादे और शांति प्रस्ताव के साथ

कई पुनरावृतियों के बाद
हालाँकि
हम जान जाते हैं
हर बार की तरह
इस समझौते का भी जल्द ही
हम कर जायेंगे अतिक्रमण
और अतीत के अनुभवों से समृद्ध
लड़ेंगें पहले से कहीं भयानक लड़ाई

क्योकि समय के साथ
हम जान जाते हैं
एक दुसरे की कमजोरी।
और तानो उलाहनो के
हमने इक्कट्ठे कर लिए होते हैं
बेमिसाल मारक क्षमता वाले
अचूक अस्त्र शस्त्र

मैं बिलकुल भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हूँ

मैं बिलकुल भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हूँ
इसलिए की न मैं भारत हूँ
न भारत का संविधान

मेरी एक जात है
और एक धर्म भी
जो अक्सर आवश्यक रूप से
अंकित करने पड़ते हैं
उन सभी सरकारी गैर सरकारी
कागजातों पर बने
निर्धारित कॉलमो में

हालाँकि मैं नहीं रहा कभी कोई राजनितिक प्राणी
पर चस्पां कर दी जाती है
कुछ उपमाएं अपने धर्म का नाम लेते ही
ये हालत इधर भी हैं उधर भी

बहुत समय तक पालता रहा मुगालता
कि हुआ जा सकता है संविधान सा
जाति मजहब के ऊपर
किसी खास दिन खास तरह की
टोपी पहन और दावत में शरीक होकर
देश के नेताओं सा
बना जा सकता है
किसी जाती वर्ग या धर्म विशेष
का हिमायती चंद बयान देकर

तथष्ट रहना गुनाह है मित्रों आज के समय में
दोगले बनो
निजी और सार्वजानिक जीवन का फर्क जानो
अब वो समय बिलकुल नहीं रहा
जो हो वो दिखो
क्योकि वही दोगले लोग
जो है आस पास
कुछ मित्रों में शुमार
लगे हैं नेपथ्य से
आपके चिर हरण में लगातार

राजदंड

एक कुछ शब्द लेकर चला
और कुछ सपने
दूसरा हथियार लेकर चला
और नृशंसता
तीसरा भ्रष्टाचार लेकर चला
और अनैतिकता
तीनो के हाथ में राजदंड था
तीनो संसद पंहुच गए

जिनमे इस तीनो में कुछ नहीं था
या था तीनो से कुछ कुछ
जनता बने
कुढ़ते कोसते खुद को
अपने सपने
हथियार
नृशंसता
भ्रष्टाचार
अनैतिकता
सब को तौलते
तुलना करते उन सब से
जो पहुँच गए थे संसद
इन सबकी बदौलत।

अंत में
अपनी किस्मत को कोसते
अपने अपने चरित्र के
नायकों के पीछे
खड़े पाए जाते
ये लोकतंत्र के आवारा मसीहा
इस मुगालते में की
लोकतंत्र में
कितनी महत्वपूर्ण है
उनकी भूमिका

पेड़ और पिता                        

बेरोजगार पुत्र और कुवाँरी बेटियों के
दोनों किनारों के बीच
घर के जरूरतों की
दिन-ब-दिन बढती खाई पर पड़े
किसी पेड़ के तने से हैं पिता

यूँ तो कोशिश करते रहे पिता
तमाम… उम्र
कि हो जाएँ पुल
जिससे होकर आसानी से गुजर जाये
उनके बच्चों का जीवन निष्कंटक
वो पा सकें एक सुन्दर सुरक्षित भविष्य

तब विशाल वटवृक्ष की तरह थे पिता
नदी के किनारे खड़े,
काफी दूर और गहरे तक जमा रखीं थी जड़ें
जो रोक सकता था कटाव
मोड सकता था नदी की धार
जो काट सकती थी उसके घर के नीचे से जमीन

देता रहा आश्रय, पालता रहा पेट
तमाम मुश्किलों के बावजूद विमुख नहीं हुआ
कभी अपनी जिम्मेदारियों से
बिखेरता रहा मुस्कान
परिवार के खुशियों पर न्योछावर करता रहा
अपने तमाम सुख, सारे अरमान

वरोह को पकड़ जैसे नदी में झूल जाते हैं बच्चे
और उफ़ तक नहीं करता बरगद का पेंड़
पिता की लंबी मूंछ पकड़
हम लटक जाया करते थे उनकी गोद में.

अब सोंचते हैं, तो लगता है …
उस दर्द के बावजूद कैसे मुस्करा लेते थे पिता
और अपने गोद में कस
हमारे हाथों, ललाटों को चुमते
तब भी कितना करते थे प्यार
कभी झिडक भी दिया हो अनायास
तो तय था मिलना कोई सौगात

पेड़ की तरह ही
पिता ने भी नहीं सीखा संचय
जितना कमाते लुटा डालते पाई-पाई
पत्नी की खुशी पर,
बेटे-बेटियों की मुस्कान पर
पोते-पोतियों की जिद पर
दोस्तों रिश्तेदारों की जरूरतों पर
नहीं बचाया अपने लिए आखिर तक
एक भी पाई
ठीक वैस ही जैसे नहीं बचाता पेड
अपने लिए आखिरी फल भी

नदी की तेज धार और मौसम की बेरुखी को
झेलने में जैसे अब सक्षम नहीं रहा पेड
समय के प्रवाह को रोकने में
सक्षम नहीं रहे पिता

अपने संघर्ष और जिजीविषा के बावजूद
गिर ही पड़ा वह विशाल पेंड आख़िरकार
जड़ों में जकड़ी मिट्टी को देख
समझा जा सकता था उसके संघर्ष की दास्तान

गिरने के बाद भी
उसे बहा नहीं पाई नदी की तेज धार
अभी भी कुछ जड़ें जमी हैं मिट्टी में
घर के आस-पास

और चाहें पुल ना हो पायें हो पिता
पर पाट तो गए ही नदी की गहरी खाई
थोडा संभल के ही सही
जिससे पार हो सकता है उनका पूरा कुनबा I

छलावा

तुम्हे जीताने की खातिर
जब मारा गया मेरा पति
मैं पी गई थी आँसू
गर्व से चौड़ी थी छाती
पति की मौत सचमुच क़ुरबानी लगी थी

तब बिन बुलाए ही आते रहे थे
तुम हमरी टोली मे
करते थे इन्कलाब की बात
हमारे जवान होते बच्चों के हाथों में
ठुसते रहे हथियार
कि जरुरी है इसका हाथ में होना
पाने के लिए अधिकार

मुझे अच्छी तरह याद है
तब तुमने कहा था
हमारी मजबूती के लिए जरुरी है
किसी अपने आदमी का सरकार में होना
कि अपने आदमी के सरकार में होने से
बहुरेंगें हमारे दिन
हमारे छान पर बैठा दलिदरा जरुर भागेगा
स्कूल का मुँह देखेंगे हमारे बच्चे
एक दिन बड़े आदमी बनेगें
कसम से अच्छी लगती थी तुम्हारी बातें
तुम्हारे आँखों में
अपने सपनों को पलते हुए देखना

आज जब तुम सरकार हो गए हो
हमारे माई-बाप
माथे पर धरे इनाम
दर-दर की ठोकरें खा रहें हैं हमारे लाल
पुलिस ने उखाड़ दिया रहा सहा भी छान
सात दरवाजों के पार
अब तुम तक पहुंचती ही नहीं हमारी फरियाद

मजूरी करने लायक भी नहीं छोड़ा तुमने
गाँवों में ऐसी लगायी आग
खेत-खलिहान सभी हो गए खाक
धरती हो गयी बेवा
हम भी हो गए अनाथ
बनिया भी भला कब तक देता उधार
दो जून की रोटी के लिए
भटकना पड़ रहा है दर-दर
छोड़ घर-बार

तार-तार होता गया विश्वास
काँधे पर उठाये अपने सपनों की लाश
भूख से बिलबिलाते बच्चों की
सहलाती, ऐंठती अंतडिया
उन्हें बहलाने की कोशिश में दिखाती हूँ चाँद
जहाँ जा बसा है उनका बाप
और जब पूछते हैं बच्चें
आसमान में क्यों जा बसा उनका बाप

भर आतीं हैं आँखें
भर्राये गले से निकलती नही आवाज़

अब छलावा लगता है
पति को दिया जाना शहीद का नाम
सब समझ में आ रहा है, बिल्कुल साफ
कि कैसे बलि का बकरा बनाया गया था उन्हें
जिसका मांस नोचकर खा रहे हो तुम
और गटक रहे हो शराब

आज तुम्हे याद नहीं रहे हमारे सपने
ऐंठती अंतडिया और ठंडे पड़े चूल्हे

काली छतरी

मेरी माँ जब कोसती है मुझे
मेरे निकम्मेपन पर
मैं कोसता हूँ उस काली रात को
जिसने बसा दिये मेरे आँखों में
सुनहरे सपने

अब जबकि सपनों के उग आये हैं पंख
और उड़ने के लिए नहीं मिलता आकाश
तो क्या करें?

अब क्या करें…
कि हमारे हाथों के पहुँच से दूर है चाँद
और उसे पाने के लिए
बच्चों सा मचल जाये मन.

इतना आसान भी तो नहीं है
तिलस्मी कहानियों के जादूगर सा
बढा लेना हाथों कि लम्बाई.

पानी भर थाल में उतारकर चाँद
खुश भी हो लें तो
उन प्रतिबिम्बों को पकड़ने की कोशिश में
भला क्या आता हाथ

अब जबकि ठीक माथे पर
आ चुका है सूरज
परछाइयाँ भी,
पैरों की बिवाईयों में
घुसने को हैं व्याकुल

इतनी शक्ति भी तो नहीं है,
कि हनुमान सा
निगल जाएँ सूरज को ही

ऐसे में माँ चाहती है
मैं मोल लूँ एक छतरी
सूरज की गर्मी
कम ना करे… ना सही
अपने ऊपर तो तान ही लूँ
कोई काली छतरी

बोंसाई

बच्चों का किलकिलाना
पक्षियों का चहचहाना
पानी का बहना
फूलों का खिलना
पौधों का बढ़ना
अब सब कुछ
ऐसा ही स्वाभाविक नहीं रह गया

अब चलने सीखने से पहले ही
लाद दी जाती हैं किताबों की बोरियां
मासूमों के कन्धों पर
और खड़े होने से पहले ही
झुक आता है उनका बचपन

अब फूलों के मौसम
पूछने का वक्त भी नहीं रहा
बेवक्त मुरझा जाते हैं कमबख्त
इनके रंगों में नहीं दिखता कोई आकर्षण
सुगंध में कोई कशिश
कि अब कोई तितली मेरे फूलों पर नहीं आती
अब कोई तोता मेरे अमरूद पर नहीं आता
कोई गिलहरी मेरे घर के मुकों में
बच्चे नहीं जनती
कोई मैना जतरा नहीं उचरती
अब कोई कौवा भी सूचना नहीं देता
आगंतुकों के आने की

अब मुहावरा नहीं रह गया है
हथेली पर उगाना सरसों
अपने बलरेज पर उगा सकते हैं
पूरा का पूरा जंगल
पीपल, आम और बरगद

कि वजूद में छोटे होने की कीमत
अधिक होने लगी है अब

उखाड़ फेंकना होगा

इसके पहले
कि धरती में गहरी जमा लें जड़ें
सोख ले इसकी सारी नमी
बंजर बना दे धरती
उखाड़ फेंकना होगा उन दरख्तों को

उखाड़ फेकना होगा उन दरख्तों को
जो रोक लेते हैं
सूर्य की रौशनी, उसकी ऊष्मा
अपने जड़ों में नहीं पनपने देते
कोई पौधा

उखाड़ फेकना होगा उन दरख्तों को
जो किसी भी क्षण
अपनी विशालता के साथ ही गिर पड़ेगा
नवजातों पर कहर बन और
असमय ही समाप्त कर देगा
उनकी इहलीला

क्या पता …
और क्या-क्या दबकर समाप्त हो जाये
उसके नीचे, और
दरख्तों की सच्चाई बताने के लिए
जीवित नहीं बचे कोई चश्मदीद गवाह

खोंखले हो रहे उन दरख्तों पर
जरूरी है रखना नज़र
इसके पहले
कि इसमें बसने लगे नाग
चट कर जाये घोसलों से अंडे
घोले हवाओं में जहर
उखाड़ फेंकना होगा उन दरख्तों को
उखाड़ फेंकना होगा

सुनो स्वर्गाधिपति

सुनो स्वर्गाधिपति
हमारे भाग्य के नियंता बन
तुम जहाँ बैठे हो या बिठा दिए गए हो
जहाँ स्थापित कर दिया गया है तुम्हे
लाख कोसने, गालियाँ देने
यहाँ तक कि तुम्हारे आस्तित्व पर
प्रश्न-चिन्ह लगाये जाने के बाद भी
तुम बने हुए हो अक्षुण्ण…
चिरस्थाई मुस्कान बिखेरते
गर्भगृहों में
हमारी आस्थाओं में
खण्डित होने के बाद भी

स्वर्गाधिपति
भले ही हमेशा हिलता रहता है
तुम्हारा सिंहासन
किसी महिषासुर का बल या
विश्वामित्र की तपस्या
नहीं छीन सकती तुमसे तुम्हारी सत्ता

संसार को मायाजाल में उलझाये रखने की
तुम्हारे पास बहुत है युक्ति
रम्भा, मेनका या उर्वशी या
तुम्हारे कल-छल का बल
डिगा सकता है किसी की तपस्या
रोक सकता है स्वर्गारोहण से
किसी को …

किन्तु जब तुमसे ही उत्पन्न
तुमसे ही वरदानित
आसुरी शक्तियों का उभरता है तांडव
और अपने सारे कल, छल, बल के बावजूद
असमर्थ होने लगते हो विजयी होने में
खतरे में पड़ जाता है तुम्हारा स्वर्ग
तब अपनी-अपनी शक्तियों के समन्वय से
उत्पन्न कर एक शक्ति
अपने-अपने आयुधों से लैश कर
जब समर में उतारते हो रणचंडी

तब इन्द्र !
तुम्हारी सत्ता को कौन दे सकता है
चुनौती …

कहो तो सही राम 

कहो तो सही राम !
किसने किया था पाप
इन्द्र ने कि अहिल्या ने ?

फिर अहिल्या क्यों बनी पत्थर
पथराई आँखों से कराने को अपना उद्धार
करती रही
तुम्हारे अवतरित होने का इंतज़ार ?

ऋषि गौतम
इन्द्र के षड़यंत्र का तो
तुम्हे भी नहीं हुआ था भान
और ब्रम्हमुहूर्त के पहले ही
चले गए थे करने गंगा स्नान
तब तुम्हारा ही वेश धर आये
इन्द्र को नहीं पहचानने पर
कैसे लगाया लांछन
अहिल्या को कैसे दे दिया श्राप ?

राम !
तुम्हे भी तो नही हुआ था विश्वास
जिस सीता ने
तुम्हारी मर्यादाओं की खातिर
वन-वन छानी खाक
किसी के कहे पर
उसे कैसे दे दिया वनवास ?

कहो तो सही राम !
जिन आदर्शों की खातिर
तुमने बाली का किया वध
रावण का किया संहार
इन्द्र को कैसे बख्श दिया राम?

राम!
तुम हो या ऋषि गौतम
तुम्हारे पुरुष अहं का झेलती संत्राश
अहिल्या हो या सीता
कब तक देती रहेगी
अपने सतीत्व की अग्नि-परीक्षा

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *