विशिष्ट कवयित्री : मंजुला उपाध्याय ‘मंजुल’
मिट्टी में जडे़ं कसीदे कारी वाले गमलों में आश्रय देकर इतरा रही है अपनी सम्पन्नता पर तुम्हारी सोच । मेरी हरी भरी डालियां खिला खिला यौवन देखकर तन जाती है…
मिट्टी में जडे़ं कसीदे कारी वाले गमलों में आश्रय देकर इतरा रही है अपनी सम्पन्नता पर तुम्हारी सोच । मेरी हरी भरी डालियां खिला खिला यौवन देखकर तन जाती है…
वो चालीस मिनिट – मधु सक्सेना तेजी से चला जा रहा था थ्री व्हीलर । उतनी ही तेजी से मीठी के विचार ।आज साथ मिला कितने दिनों के इंतज़ार के…
पारिवारिक विघटन और हिंदी महिला उपन्यासकार पितृसत्तात्मक परिवार की जिस संरचना और स्वरूप को हमने अब तक समझा है उसके संदर्भ में महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में पारिवारिक विघटन की…
1 हद से भी बढ़ जाएंगे तो क्या करोगे चांद पर अड़ जाएंगे तो क्या करोगे इस क़दर आवारगी में दिल लगा है हम कभी घर जाएंगे तो क्या करोगे…
(1) जितने लोग पढ़ेंगे पढ़कर, जितनी बार नयन रोयेंगे समझो उतनी बार, गीत को लिखने वाला रोया होगा। सदियों की अनुभूत उदासी यूँ ही नहीं कथ्य में आयी आँसू आँसू…
जीवन, प्रकृति और समाज की अभिव्यक्ति : समकालीन हिंदी ग़ज़ल – डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय ग़र जमीं पर बाँट देने की हवस बढ़ती रही जंग कंधों पर उठाकर आसमां ले…
महारानी एक्सप्रेस तारा को छोटी बहन की बातें याद आ रही थीं। जब वे गोवा में थे वह वहाँ की औरतों को देखकर चहक उठती थी -‘माँ यहाँ तो बड़ी-बड़ी…
1 पांव को आये न देखो आंच बस्ती में हर तरफ बिखरे हुए हैं कांच बस्ती में क्यों मरी उसके कुएँ में डूबकर औरत चल रही सरपंच के घर जांच…
वर्जना का दौर, इसमें प्रेम का अध्याय गढ़ना, है कठिन क्या? पर्वतों से हो गए जग के प्रणेता राह में जब, प्रेम की नदिया निकल बहती धरा की चाह में…
सर-सर बहा पवन अकस्मात इस मधुवन में सर-सर बहा पवन तभी देखने में आया इक नटखट मौसम झूम उठी हर टहनी जैसे झूम उठें झूमर कई जंगली चिड़ियां बैठी झूल…