विशिष्ट गीतकार : गरिमा सक्सेना
पतझर-सा यह जीवन जो था शांत, दुखद, बेहाल उसमें तुम फागुन-सा आकर प्रिय मल गए गुलाल गम को निर्वासित कर तुमने मेरा मोल बताया जो भी था अव्यक्त उसे अभिव्यक्त…
पतझर-सा यह जीवन जो था शांत, दुखद, बेहाल उसमें तुम फागुन-सा आकर प्रिय मल गए गुलाल गम को निर्वासित कर तुमने मेरा मोल बताया जो भी था अव्यक्त उसे अभिव्यक्त…
स्पर्श के संस्मरण ये सब तुम्हारे थिर था प्रतिबिम्ब छुआ दी तुमने तर्जनी की पोर देर तक काँपता रहा तालाब ऊष्मा रख दी गले पर अटकी रह गई साँसें कुतर…
रात चाँदनी चुपके आई खिड़की से सिरहाने में! सुबह सुबह तक रही सुबकती लीन रही दुलराने में! पता नहीं क्यों लापता रही कितने दिन बेगानों-सी इधर रही पर मेरी हालत…
सोपान तोड़कर अपार अनंत से, अनाम सा फूल कोई बेनाम सा फूल कोई बदनाम सा फूल कोई कि मादक है खुशबू उसकी बेहोश करती है बुलाती है चर, अचर, निशाचरों…
प्रेम रोग तेज धड़कनों का सच समय के साथ शायद बदल जाता है ना कभी नजरों के मिलने भर से ही या स्पर्श भर से स्वमेव तेज रुधिर की धार…
तुम ख्वाब की तरह जलती हो मैं लैम्प पोस्ट की तरह रोशन राह दिखाता हूँ न जाने कितनी सदियों का नफरत मुझे लहूलुहान किया इसी मोड़ पर इसी मोड़ पर…
गुम हो गई कविता के मिलने की खुशी बीते बरसों को पलटकर देखना मुश्किल होता होगा , लेकिन तुम्हें बताऊँ ? बावरे मन ने तो इस सफर को महज चालीस…
आजा तेरे हुस्न का सदक़ा मैं उतार दूँ फूल सारे बाग़ के आज तुझपे वार दूँ तेरी सारी उलझनें हँस के मैं संवार दूँ तेरे सारे रंजो ग़म खुशियों से…
इम्तिहा-इम्तिहा मुख़्तसर सी जमीं, मुख़्तसर आसमाँ उसपे इतना घना,ये धुआँ, ये धुआँ. वो मोहब्बत का सारी उमर यूँ मेरी सिर्फ़ लेता रहा , इम्तिहा, इम्तिहा अपने दामन में अंगार बांधे…
प्रिये! प्रीत की रीत तुमने न जानी विरह में समय ज्यों गुज़ारा हृदय जानता है हमारा हमेशा उदासीनता ही रही साथ बनकर सहारा व्यथा यह तुम्हारे लिए है कहानी तुम्हारे…