पुस्तक समीक्षा :: डॉ.जियाउर रहमान जाफरी

मधुरता और मिठास के साथ मुद्दों पर लिखा गया गीत

जहाँ नहीं उजियार योगेंद्र प्रताप मौर्य लिखित नवगीत का नया संग्रह है. इससे पहले नवगीत की एक तथा बाल कविताओं की दो-तीन किताबें उनकी प्रकाशित हो चुकी हैं. नवगीत गीत के बाद की ऐसी विधा है जिसने अपनी अभिव्यक्ति के लिए नये शिल्प, नई भाषा, मुहावरे और भवबोध तलाशे हैं. नवगीत छंद विधान का पालन करते हुए भी अपनी अभिव्यक्ति को सरल और सहज तरीके से पेश करता है. उसमें वह मधुरता और मिठास पाई जाती है, जो हमारे दिल में उतरने का माद्दा रखती है. योगेंद्र प्रताप मौर्य ने अपने इन साठ गीतों में उस नाज़ुकी का पूरा ख्याल रखा है. उनका पहला गीत ही युद्ध की विभीषिका पर है, जिसमें वह सब बच्चे हताहत हो रहे हैं,जिन्हें युद्ध के बारे में पता भी नहीं है-

युद्ध कितने रोज़ होंगे

कौन साजिश कर रहा है

गड़गड़ाती है मिसाइल

और बच्चा डर रहा है

उनके गीत को पढ़ते हुए आशा और निराशा दोनों के भाव जगते हैं. जहां उम्मीदों के गीत, हम कर्मठ इंसान, सूरज उगता है जैसी रचनाएं हमें कर्मठता की तरफ़ आमादा करती हैं, वहीं दहशत है सन्नाटा है, रोज बांटती है सुख आदि में गीतकार समय की बेबसी देखकर  निराशा की तरफ़ चला जाता है.देखने की बात ये है कि ऐसे आलम में भी कवि बढ़ते रहने का संदेश देता है-

आगे -आगे राह दिखाता

सूरज चलता है

जब भी मिलता है श्रम का फल

मीठा मिलता है

गीतकार एक बिंब रचता है, तथा अधिकतर तटके प्रतीकों और उदाहरणों  के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता है-

बात-बात पर सूरज तारे

गाल बजाएं

सोच समझ कर सपनों की

करते हत्याएं

आगे गीतकार एक ऐसा संदेश देता है, जिसकी ज़रूरत और ख्याल हर एक हिंदुस्तानी के लिए लाज़िम है-

है हड़ताल ज़रूरी

बातें भी लवाना

ठीक नहीं है किंतु सड़क पर

देश जालना

इस संग्रह के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता  मनुष्य को मनुष्यता की तरफ़ वापस लाना है. गीतकार बार-बार मासूम सा प्रश्न करता है, जिसका मर्म हमारे हृदय में चुभता हुआ निकल जाता है-

अपने भीतर इतनी आग

कहां से लाते हो

आखिर क्यों गंगा जमुनी

तहज़ीब मिटाते हो

इस प्रकार हम देखते हैं कि बनावट और बुनावट दोनों दृष्टि से यह संग्रह महत्वपूर्ण है.ज़िन्दगी की जिस गहरी सच्चाई को यहां उतारा गया है, यह गीतकार के संवेदनशील मन और सघन अनुभूति का परिचायक है.

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कृति -जहां नहीं उजियार

गीतकार – योगेंद्र प्रताप मौर्य

कलाकार पब्लिशर्स नई दिल्ली

वर्ष -2025,मूल्य -350/-पृष्ठ -127

समीक्षक – डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री़

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ग़ज़ल की तहज़ीब से वाबस्तगी

हिंदी ग़ज़ल परंपरा में कई रचनाकार ऐसे हैं, जो मूलतः दूसरी विधाओं में रहकर हिंदी ग़ज़ल में आए हैं. उसमें भी वो रचनाकार अधिक हैं, जिनका ताल्लुक हिंदी गीत अथवा नवगीत से रहा है. स्वयं दुष्यंत भी हिंदी कविता से ग़ज़ल की तरफ़ नमूदार हुए थे. उन्होंने इसकी वजह भी बताई, और वह वजह थी, अपनी बोझिलता के कारण छंद मुक्त कविता का पाठकों से दूर हो जाना.

असल में नवगीत से ग़ज़ल की तरफ़ आने के कुछ अपने कारण भी हैं.ग़ज़ल और नवगीत अलग-अलग विधा होने के बावजूद दोनों एक दूसरे से कुछ न कुछ नज़दीक हैं. दोनों ही छान्दसिक विधा है, और दोनों का अपना तुक विधान है. अंतर मूल रूप से लहजे का है.ग़ज़ल में जहां पुरुषत्व बोलता है,वहीं नवगीत की विधा में कोमलता प्रमुख रही है.

अशोक कुमार नीरद भी ऐसे ही रचनाकार हैं, जो ग़ज़ल में आने से पहले गीत विधा में स्थापित हो चुके थे. नीरद दुष्यंत के समकालीन हैं. जिस समय दुष्यंत ग़ज़ल लिख रहे थे, अशोक कुमार नीरद उस समय ग़ज़ल और गीत दोनों में अपने को लगातार स्थापित कर रहे थे.

मुशायरों में ग़ज़लों की लोकप्रियता ने उन्हें ग़ज़ल की तरफ़ आकृष्ट किया, इसका मतलब यह नहीं है कि वह ग़ज़ल के नए शायर हैं. अशोक कुमार नीरद पिछले पचास वर्ष से अधिक समय से ग़ज़लें कहते लिखते और सुनते आ रहे हैं, यह अलग बात है कि उनकी ग़ज़लों का पहला संग्रह 2008 में जुगनू को सूरज का भ्रम है नाम से प्रकाशित हुआ, लेकिन फिर यह सिलसिला लगातार चल पड़ा. दीवारों के जाल,अंकुर बोलते हैं, पैमाने नये आये जैसे ग़ज़ल संग्रह उनके लगातार प्रकाशित होते गए. यहां तक कि मुंबई विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी उनकी ग़ज़लें प्रमुखता से रखी गईं.

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें ज़मीन से जुड़ी हुई हैं, यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के बेशतर आलोचकों के भी वह प्रिय शायर हैं. कमलेश भट्ट कमल को जहां उनकी ग़ज़लों का तेवर पसंद आता है, वहीं हरेराम समीप और अनिल गौड़ को उनके द्वारा ग़ज़ल में किए गए प्रयोग अच्छे लगते हैं.

पैमाने नये आये अशोक कुमार नीरद के सौ से अधिक ग़ज़लों का संग्रह है. जिससे गुज़रते हुए उनकी ग़ज़लों के कथ्य की कसावट और बहर की पुख्तगी का पता चलता है. नीरद जब कहते हैं –

 

सबकी आंखों का नूर कंचन है

दोषियों में शुमार दर्पण है

तो वह उस सारी व्यवस्था को कटघड़े में लाकर खड़े कर देते हैं, जहां मज़लूम को ज़ालिम करार देने की रवायत चल पड़ी है.

उनके ज्यादातर शेर किसान मज़दूर और उस वंचित वर्ग के साथ हैं, जिनकी मासूमियत ने उन्हें फ़रेब में डाल रखा है. ऐसा भी नहीं है कि वह सिर्फ समस्या खड़ी करते हैं, बल्कि अक्सर उसका हल भी सुझाते हैं, और यही व्यवस्था उन्हें समकालीन ग़ज़लकार से अलग करती है.किसान पर हिंदी ग़ज़ल में बहुत लिखा गया. उससे सहानुभूति दिखाई गई, पर जब नीरद किसान को अपनी ग़ज़लों में लाते हैं, तो सबसे पहले इस मार्ग की कठिनाइयों के प्रति आगाह करते हैं-

खेती करेगा ख़ाक मोहब्बत की बावरे

इसमें चुकाना पड़ता है ख़ुद को लगान में

यह शेर अपनी व्यंजनावली में उस सिरफिरे लोगों के लिए भी है,जिन्होंने मोहब्बत को आसान समझ रखा है. कबीर ने कभी आगाह किया था कि यह वह रास्ते हैं जिसमें अपने घर को ख़ुद आग लगानी पड़ती है.

शायर का ध्यान गिरते हुए नैतिक पतन पर भी है. एक समय था जब मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती थी. आज यह जगह दौलत ने ले ली है. अशोक कुमार नीरद का एक सीधा सा शेर इस सच्चाई को खोलकर रख देता है-

दौलत बढ़ी है ख़ूब पर इज़्ज़त नहीं रही

इस दौड़ में ज़मीर की क़ीमत नहीं रही

वह अपनी ग़ज़लों में सचेत करते हैं, और इस सच्चाई से अवगत कराते हैं कि वक्त बदलने में वक्त नहीं लगता –

हिक़ारत से जिन्हें तुम देखते हो

उन्हीं क़तरों से तो सागर बने हैं

और फिर यह भी कि –

इशारों पे मेरे चलती थी कल तक

वही दुनिया मुझे ठुकरा चुकी है

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें कई शैली से होकर गुज़रती है. भाषा के नज़रिए से जहां उन्होंने हिंदी -संस्कृत का मोह अधिक रखा है, वह ग़ज़लें कमजोर पड़ी हैं, लेकिन जहां वह बोलचाल की आम ज़बान अपनाते हैं,जो हिंदी ग़ज़ल की फ़ितरत भी है, वह शेर अच्छे बन पड़े हैं. कई जगह पर बहर की बंदिश ने भी कथ्य को प्रभावित किया है. समकालीन हिंदी ग़ज़ल कई बार रूपवादी रुझानों के कारण यथार्थ और अभिव्यक्ति से दूर हो जाती है.

कहना न होगा कि अशोक कुमार नीरद के पास ग़ज़ल का हुनर है. आसपास की घटनाओं को भी रखने के तौर तरीके हैं, और उसे ख़ूबसूरती से समेटने का शैली और मोडेलिटी है. यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल की नित्य बढ़ती हुई भीड़ में भी उनका चेहरा नुमाया नज़र आता है.

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पुस्तक – पैमाने नये आये (ग़ज़ल-संग्रह)

अशोक कुमार नीरद

वर्ष-2025,मूल्य-375/-

लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नयी दिल्ली

समीक्षक – डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

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ग़ज़ल में नया हुनर

अभिषेक कुमार सिंह ने थोड़े ही समय में हिंदी ग़ज़ल में अपनी ख़ास शनाख़्त बना ली है.उसकी अपनी वजह भी है.उन्होंने ग़ज़ल में नये प्रतीक और नये रदीफ़ तलाशे हैं.ग़ज़ल लिखते हुए न उन्होंने किसी दूसरे का ख्याल लिया है,और न ग़ज़ल के किसी पारंपरिक काफ़िया को अपनाया है.ऐसा भी नहीं है कि उनके पास विशाल तजुर्बा है,लेकिन अपने ख्यालों को नयेपन के साथ ग़ज़लों में समेटने की चमत्कारिक शैली है.यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के युवा रचनाकारों में वह सरे फ़हरिस्त हैं.वीथियों के बीच के बाद उनका नया ग़ज़ल संग्रह उजालों के आसपास आया है. ज़ाहिर है शायर दुनिया के अंधेरों से निकल कर उजालों के पास जाना चाहता है,और इस कोशिश में वह उसके आसपास मंडराकर रह जाता है,क्योंकि बारिश, बादल,हवा, ज़मीन की तरह उजालों को भी देश के रईसों ने ख़रीद लिया है.उनकी ग़ज़लें हमें आश्वस्त करती हैं कि जहां कहीं भी बेईमानी,नाइंसाफी, वर्गभेद और तीरगी है, उस माहौल के ख़िलाफ़ साथ देने के लिए एक शायर खड़ा है.वह जब ग़ज़लें लिखते हैं, पूरी कायनात उनके साथ खड़ी हो जाती है.कहते हैं किट्स जब तपेदिक से मर रहे थे,तो उनकी दोस्त फ़ैनी पार्टी में अन्य पुरुषों के साथ दिल बहला रही थी.अभिषेक कुमार सिंह की ग़ज़लों की यह ख़ूबसूरती है कि उनकी उदासी पूरे जहां की उदासी बन जाती है.भाषा के दृष्टिकोण से भी उन्होंने जो मुहावरे गढे हैं,वह हिंदी ग़ज़ल में सिर्फ उन्हीं की थाती है.असल में वह ग़ज़ल लिखते हुए पूरी एहतियात बरतते हैं,और इस कोशिश में उनके एक-एक शेर किसी नगीने की तरह निखर जाते हैं.अतुल अजनबी का एक शेर है कि –

वो एहतियात बरतने का इतना आदी था

ज़रा सा काम उसे बार-बार करना पड़ा

उनके कई शेर ऐसे हैं.जो पौराणिक प्रतीकों को आधुनिक संदर्भ में उठाते हैं.एक ग़ज़ल के कुछ शेर देखें –

जलवायु में परिवर्तन की बात करेंगे

शातिर बादल अपने मन की बात करेंगे

जब जब सीता को अपमानित करना होगा

दुनिया वाले इक धोबिन की बात करेंगे

शबरी के बेरों को जूठा करने वाले

कैसे राम के निश्छल मन की बात करेंगे

ये ऐसे शेर हैं जो हमारी दोहरी नीति को बेपर्दा करते हैं. असल में आज का इंसान कई परतों में जी रहा है, इसलिए उसकी पहचान की कोशिश में आदमी बार-बार फरेब खा रहा है. ऐसे ही कुछ और शेर देखें –

बसाना था जहां कुछ बेघरों को

वहां भेजा गया बुलडोज़रों को

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नफ़रतों का यह बवंडर कौन रोकेगा यहां

अनगिनत नाथू खड़े हैं गांधियों के वेश में

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ऐसा न हो के सारा अडानी ख़रीद ले

तू अपनी प्यास के लिए पानी ख़रीद ले

क्या कहें किस हाल में मारा  गया

न्याय अमृत काल में मारा गया

यह ऐसे शेर है जिसे वही शायर लिख पाता है,जो किसी खौफ़ से भयभीत नहीं होता,और न जिसे बादशाहों के तलवे चाटने की ज़रूरत पड़ती है.पूरी हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत और अदम को छोड़ दें तो जहां बच- बचाकर लिखने का रिवाज है. अभिषेक कुमार सिंह हुकूमत की नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ खुलकर खड़े होते हैं,और कई बार तो वह बग़ावत पर आ जाते हैं. कुछ और शेर देखें –

नाचती है शाह का आदेश सुनकर

न्याय की देवी रखैली हो चुकी है

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डार्क फ़िल्मों के चरित्रों की तरह हो जाएंगे

लड़ते लड़ते लोग गुंडों की तरह हो जाएंगे

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हम मजूरों को ठिठुरना है सदा

हां कभी बीड़ी जला ली जाएगी

यह वह शेर है जिसमें पूस की रात का सारा कथानक निचोड़ कर रख दिया गया है.

उनकी शायरी में जहां कहीं थोड़ा बहुत प्रेम है, वहां भी उनकी मासूमियत झलकती है. न कोई चाहत न कोई फ़रेब न कोई नुमाइश बस शायर इतना ही कह पाता है कि –

दिल वालों की सोहबत ज़िंदा रखती है

मुझको मेरी आदत ज़िंदा रखती है

मैंने जीना छोड़ दिया तो यह जाना

मुझको तेरी चाहत ज़िंदा रखती है

पर शायर बहुत देर तक इस मोहब्बत की भी जाल में नहीं फसता, और अगले ही पल एक ऐसा शेर कह देता है, जिसमें कई हिंसक देशों की परतें खुल जाती हैं और उसका अंधकार भविष्य हमारे सामने आ जाता है-

हिंसक होकर इक दिन वे मर जाते हैं

जिन धर्मों को दहशत ज़िंदा रखती है

ऐसे ही ख़ूबसूरत अनूठे, और चौंकाने वाले शेर इस संग्रह में भरे पड़े हैं, जिसे पढ़ते हुए हम हैरतज़दा हो जाते हैं, और इस शायर के मुरीद हुए बिना नहीं रहते.

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 उजालों के आसपास (ग़ज़ल-संग्रह)

अभिषेक कुमार सिंह

वर्ष 2025, मूल्य 195, पृष्ठ 120

श्वेतवर्णा प्रकाशन नोयडा

समीक्षक – डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

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ग़ज़ल में बुनियादी सवालों से टकराता हुआ शायर

अविनाश भारती हिंदी के एक ऊर्जावान ग़ज़लकार हैं. छपरा यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हुए वह  ग़ज़ल के लिए लगातार काम कर रहे हैं. अपनी पहली कृति आने से पूर्व ही लगातार लेखन और प्रकाशन के कारण उन्होंने अपनी शनाख़्त बना ली है. आईने से पूछो उनका पहला मौलिक ग़ज़ल संग्रह है, जिनमें उनकी छप्पन ग़ज़लें मौजूद हैं. इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए यह साफ़ पता चलता है कि अविनाश भारती ने ग़ज़ल लिखते हुए कोई जल्दबाजी से काम नहीं लिया है. ऐसे भी ग़ज़ल जल्दी में लिखी जाने वाली विधा नहीं रही है. इसमें सिर्फ शेर की गंभीरता ही नहीं शब्दों की कारीगरी और तकनीक का भी पूरा ध्यान रखना होता है. आलोक धन्वा से लेकर ओमप्रकाश यती, विजय कुमार स्वर्णकार और डॉ.भावना आदि ने इस किताब में उनकी ग़ज़लों पर बात की है,जो अपने आप में महत्वपूर्ण है. आलोक धन्वा ने माना है कि अविनाश भारती इस तरुण पीढ़ी के सबसे संभावनाशील गज़लकार हैं. समकालीन हिंदी ग़ज़ल हमारी ज़रूरतों से जुड़ी हुई है. यहां भी स्त्री है, लेकिन वह सिर्फ प्रेयसी बनकर नहीं उभरी है. अब यह स्त्री संघर्ष करती है. नौकरी करती है.घर -बार और कारख़ाने संभालती है, वह सियासत तकनीक और समाज के अभिन्न हिस्से के रूप में देखी जा रही हैं, लेकिन अभी भी स्त्रियां की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो अपने मक़ाम के लिए जद्दोजहद कर रहीं हैं.अविनाश की पहली ग़ज़ल ही इसी संघर्ष से शुरू होती है –

जीती है क़ैद में बेटियां आज भी

हमसे टूटी नहीं बेड़ियां आज भी

फिर इसी ग़ज़ल का अगला शेर हमारी ज़रूरतों और संकटों से जुड़ जाता है –

कौन लेगा भला कोई उनकी ख़बर

जिनके हिस्से नहीं रोटियां आज भी

शायर को दुनिया की तमाम चीज़ों से मोहब्बत है. सिर्फ इंसान ही नहीं उनकी नज़रों में पेड़ -पौधों को काटना भी उसका क़त्ल करने के बराबर है, देखें एक और शेर –

हर घड़ी लग रही दुपहरी तो नहीं

पेड़ को काटना ख़ुदकुशी तो नहीं

शायर अपने शेर में कभी अपना घर- आंगन और बचपन तलाशता है, तो कभी इस मुश्किल वक्त में जिंदगी की ज़रूरतों को पूरी करने में संघर्षरत दिखलाई देता है-

छत भी अपनी आंगन अपना

सबसे अच्छा बचपन अपना

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मयस्सर नहीं जब हमें दाल रोटी

मुनासिब है कितना कमाना हमारा

यह वह फिक्र है जो अपने कई शेर में वह बार-बार दर्ज करते हैं-

अपना सब कुछ छोड़ रहे हैं

घर का राशन जोड़ रहे हैं

देखने की बात यह है कि तमाम अशआर में सारी दुनिया की चिंता करने वाला शायर इस किताब के आख़री शेर में इश्क़ की बात करता है-

इश्क़ की ये डगर हमको प्यारी लगी

ख्वाब सोये हुए हम जगाने लगे

जो इस बात की अलामत है कि मोहब्बत को ग़ज़ल से ख़ारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह हमारी पहली ज़रूरत नहीं है. इसके अलावा भी ज़माने में कई ग़म हैं.इस पुस्तक को पढ़ते हुए अंदाज़ा लगता है की अविनाश भारती ने

ग़ज़ल, आलोचना और समीक्षा में अविनाश भारती ने अपनी एक मज़बूत गिरफ़्त बना ली है. असल में उनके पास अनुभव की विशाल संपदा और शायरी की तकनीक दोनों है. वह ख्यालों को सहेजने का हुनर रखते हैं. यही कौशल और समर्पण एक शायर को बड़ा बनाता है. स्वभाव से बड़े मिलनसार और साफ़ दिल अविनाश की ग़ज़लें  किसी व्यंजना या वकरोक्ति शैली का सहारा नहीं लेती,बल्कि सहजता और सरलता के साथ अपनी बातें रखती हैं. यह अलग बात है कि साधारण से दिखने वाले इस शेर की गहराई भी कोई कम नहीं होती. इसमें अर्थ गाम्भीर्य कूट-कूट कर भरा होता है, जो अविनाश को हिंदी के अन्य नये शायरों से अलाहिदा बनाता है.

उनकी ग़ज़लों में आंखें हैं,लब है, इश्क है मोहब्बत है, चांद है,रोटी है,बच्चे हैं,छत है, पानी है.गोया कि वह सब चीज़ें जो मोरव्वत और ज़रूरत की है, उनकी शायरी में उपस्थित है.

चांद उर्दू शायरों के लिए सबसे प्रिय शब्द रहा है. यह चांद कभी इब्ने इंशा का महबूब बन जाता है,तो कभी परवीन शाकिर का हमसफ़र बन रात की तनहाई में उसका साथ निभाता है-

वो चांद बनके मेरे साथ- साथ चलता रहा

मैं उसके हिज्र की रातों में कब अकेली हुई

-परवीन शाकिर

तो कभी बशीर बद्र के साथ अठखेलियां करता है, लेकिन यही चांद जब अविनाश की शायरी में अपनी जगह तलाशता है,तो चांद से ज्यादा उन्हें रोटी की ज़रूरत महसूस होने लगती है-

मेरी ग़ज़लों का लहजा अलग क्यों न हो

चांद से पहले है रोटियां आज भी

आप कहने को कह सकते हैं कि ग़ज़ल का लहजा चांद और रोटी से नहीं बनता, वो हमारे तर्ज़, तकनीक, शैली और शब्द शक्ति से नमूदार होता है. कभी रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूं और गुलाब निबंध लिखते हुए प्रतीकात्मक रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं.

असल में रिवायत का पालन करते हुए ग़ज़ल में प्रयोगधार्मिता अविनाश की शायरी की विशेषता रही है. यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह उनकी ग़ज़लों का पहला संग्रह है,लेकिन इससे पूर्व ही उनका नाम ग़ज़ल की दुनिया में लगातार लेखन के कारण जाना जाने लगा है. जीवन में मुक्तिबोध की भी कोई कृति प्रकाशित नहीं हुई थी,लेकिन वह तार सप्तक के ऐसे पहले कवि हुए जिनके बिना हिंदी नई कविता का इतिहास नहीं लिखा जा सकता.

उनकी ग़ज़लों में एक विमर्श है.आज विमर्श में सृजनात्मकता गौण है,और यह एक विरोध की प्रवृत्ति बनकर रह गई है. उसमें चेतना,संयम,विवेक और मूल्य हाशिये पर है. अविनाश की ग़ज़ल जहां से शुरू होती है.वह महज काव्यानंद बनाकर खत्म नहीं हो जाती,बल्कि पाठकों के हृदय में हमेशा के लिए ज़ेहन नशीं हो जाती है-

बनाता है यहां जो क़ाफ़िला अविनाश मेहनत से

उसी को क़ाफ़िले वाले अकेला छोड़ देते हैं

अविनाश की ग़ज़लें शांति की खोज में निकलती है. उन्हें पता है युद्ध के नतीजे नहीं निकलते. हिंसा हमें धार्मिक अतिवाद, अनुदार,और अलोकतांत्रिक अव्यवस्था की तरफ़ ले जाती है, पर शक्तिशाली साम्राज्य के बीच हिंसा का विरोध करना भी इतना सरल नहीं होता. जॉर्जिया के कवि उपन्यासकार और विचारक नगुत्री वा शयोंग को ऐसे ही जुर्म में उन्हें जेल तो जाना ही पड़ता है,वह एक ऐसे उपन्यासकार ठहरते हैं,जिनके एक पात्र के विरुद्ध भी तत्कालीन सरकार गिरफ्तारी का वारंट जारी कर देती है.

अविनाश के पास साहस है. तभी वह ऐसे ख़तरों का मोल लेते हुए कह पाते हैं –

मिटाने की कोशिश करो चाहे जितनी

हरा ही रहेगा मेरी ज़िद का कोंपल

ग़ज़ल और हिंदी कविता की रचना प्रक्रिया में एक बड़ा अंतर यह है कि कविता स्याही से लिखी जाती है, लेकिन ग़ज़ल लिखने के लिए ख़ून को जलाना होता है. कलीम आजिज़ जिसे फ़नकार का पसीना कहते हैं.

अविनाश के पास ग़ज़ल की भाषा,लहजा और मुहावरा है.उसमें वह लोच और लचीलापन है, जो एक पाठक को रचनाकार के क़रीब लाता है. उनकी शायरी को पढ़ते हुए हमें बारंबार एहसास प्रतीत होता है कि यह दुख उनके नहीं हमारे अपने हैं.बस शायर की ज़बान शामिल है.

अविनाश की शायरी हिंदी ग़ज़ल की बेश क़ीमती शायरी के नमूने हैं, जो पढ़े और सराहे जाते हैं.खरीदें और बेचे नहीं जाते. कहते हैं सुदर्शन फ़ाक़िर को मुंबई में एक फ्लैट लेने की ज़रूरत पड़ी, तो उन्होंने जगजीत सिंह से दस लाख मांगे बदले में जगजीत ने उनसे दस ग़ज़लें मांग ली जो शराब पर लिखी गई थी.

पूरी हिंदी ग़ज़ल में शराब वर्जित है.शबाब पर पाबंदी है. हिंदी के किसी शायर ने बेचने के लिए ग़ज़लें नहीं लिखी.भवानी प्रसाद मिश्र इसी प्रवृत्ति पर अपनी एक कविता में कटाक्ष करते हैं.

कभी उर्दू में जैसे मीर ग़ालिब और इकबाल थे. फिर फ़ैज़,फ़िराक़ और नासिर क़ाज़मी का वक्त आया. ठीक वैसे ही हिंदी ग़ज़ल के पास दुष्यंत,रंग, अदम हुए, फिर जहीर कुरैशी उर्मलेश, कुंवर बेचैन डॉ. भावना,अनिरुद्ध सिन्हा हरेराम समीप और ओमप्रकाश यती जैसे लोग जुड़ते चले गए. आज हिंदी ग़ज़ल के पास एक युवा पौध भी है, जिसमें राहुल शिवाय से लेकर केपी अनमोल, संजीव प्रभाकर और अभिषेक सिंह तक का नाम दर्ज है. ठीक उसी कड़ी में अविनाश भारती पूरे दमखम और  ड्युरेबिलिटी के साथ खड़े हैं. आने वाले समय में ग़ज़ल के प्रतिमान पर जब उनकी इस कृति का मूल्यांकन होगा तो पता चलेगा कि ग़ज़ल के मिज़ाज, परवाज़, अंदाज़ और आवाज़ को समझने के लिए यह एक सहायक पुस्तक सिद्ध हुई है.

हम कह सकते हैं कि अविनाश भारती का भले ये पहला ग़ज़ल संग्रह है,लेकिन इसमें बनावट,बुनावट,सजावट और कसावट की कोई कमी नहीं है.

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पुस्तक -आईने से पूछो

(ग़ज़ल संग्रह)

शायर-डॉ. अविनाश भारती

मूल्य-199/- पृष्ठ-103,वर्ष-2025

प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन,नोएडा

समीक्षक – डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

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