मूल्यहीन होते समय में पितापरक कविताओं का अमूल्य संकलन :: डॉ पंकज कर्ण

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मूल्यहीन होते समय में पितापरक कविताओं का अमूल्य संकल

  • डॉ पंकज कर्ण

महान चिंतक बर्ट्रेंड रसेल ने कहा है:- “आनंद कोई दुर्लभ चीज नहीं है। कई बार पके हुए फल की तरह यह स्वयं हमारे मुख में प्रविष्ट कर जाता है।” इसे जीवन और संबंध के आलोक में देखें तो भौतिकवादी संस्कृति को भोगने की होड़ में आमजन किसी कारखाने की मशीन की तरह हो गया है। ऐसे में जीवन, आनंद और संबंध को बचाने की चिंता एक रचनाकार ही तो कर सकता है। वह जीवन को सुंदर, आनंदमय तो बनाता ही है साथ ही संबंधों की छांव में ठहरने को प्रेरित भी करता है। ‘साहित्य की बात’ (साकीबा) समूह एवं बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित (आदरणीय नरेश अग्रवाल जी की माता गायत्री देवी अग्रवाल के सौजन्य से प्रकाशित) इस पिता केंद्रित काव्य-संकलन ‘पिता के साए में जीवन’, तार-तार हो रहे संबंधों के बीच पिता की महत्ता को बचाने का संकल्पित संकलन है। संपादक आदरणीय ब्रज श्रीवास्तव जी, उप-संपादक मान्या खुदेजा ख़ान जी एवं सह-संपादक मान्या मधु सक्सेना जी के समर्पण एवं उत्तम सोच से उपजा यह संकलन इस सदी के धरोहर के रूप में संजोया जा सकता है। ‘काल तुझसे होड़ है’, ‘उदाहरण के लिए’, ‘कविता की पुकार’, ‘जमीन पक रही है’ एवं ‘नए इलाके में’ सरीखे पांच खण्डों में विभक्त संकलन में अज्ञेय, निराला, भवानी प्रसाद मिश्र, विष्णु खरे एवं मंगलेश डबराल सहित देश के लगभग तीन पीढ़ियों के साठ श्रेष्ठ रचनाकारों की पिता केंद्रित कविताओं को संकलन में शामिल किया गया है जिसमे एक पिता की सार्थकता एवं विवशता का प्रतिबिम्बित झलकता है।

प्रस्तुत संकलन में अज्ञेय, निराला, भवानी प्रसाद मिश्र, विष्णु खरे एवं मंगलेश डबराल की कविताओं में पिता के सरोकार एवं संतुलित जीवन के ऐसे कई बिम्ब हैं जिसने अन्तर्मन का स्पर्श किया है एवं पिता की चिंता को मूर्त रूप दिया है।

संकलन के जिन रचनाकारों की कविताओं ने पिता के चरित्र को सामाजिक दायरे से उबारकर मानवीयता के मानस-पटल पर गहराई से अंकित कर दिया है उनमे कुमार अंबुज, अष्टभुजा शुक्ल, राजेश्वर वशिष्ठ, राजेन्द्र गुप्त, बोधिसत्व प्रमुख हैं। इनकी कविताओं में पिता के अंतर्द्वंद्व का बयान भी दीखता है।

संपादकों ने बड़ी सिद्दत से पड़ताल करते हुए संकलन में उन कवियों की कविताओं को भी शामिल किया है जिनमे पिता को सांकेतिक रूप में चित्रित किया गया है। पल्लवी त्रिवेदी, कुमार अनुपम, संजय अलंग, ज्योति खरे, मणिमोहन सरीखे रचनाकारों ने पिता की विराट दुनिया और संघर्ष को स्वर दिया है।

संग्रह का ‘पिता’ वस्तुतः विषम परिस्थितियों में भी कभी नहीं टूटने वाला प्रतिबद्ध किरदार है। परंतु विडंबना है कि पिता आज की रचनाओं में जितने सम्मान और भावनात्मक रूप में सहेजे जाते हैं, परिवार में वे उतने ही उपेक्षित-सा महसूस करते हैं। अरुण सातले, भावना कुमारी, सुधीर देशपांडे, शैलेंद्र शरण, ललन चतुर्वेदी, डॉ रश्मि दीक्षित, राजेंद्र श्रीवास्तव आदि की कविताओं में पिछड़ते मूल्यों और आदर्शों के बीच पिता की सत्ता को बड़ी शालीनता के साथ स्थापित किया गया है।

इक्कीसवीं सदी के इन वर्षों में महसूस किया जा रहा है कि लोग कृत्रिमता एवं वाणी और आचरण के दोहरेपन के पीछे अंधवत भाग रहे हैं इस भागमभाग एवं आपाधापी में जीवन-मूल्य बहुत पीछे छूट रहा है। इस मुश्किल समय में संपादकों ने संबंध और मूल्य के पक्ष में खड़े पिता आधारित कविताओं को भी शामिल किया है। गीता चौबे ‘गूंज’, विशाखा मुलमुले, निधि सक्सेना, मंजुला बिष्ट, समीर दीवान आदि की कविताएं इसकी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है।

कुल मिलाकर ‘पिता के साये में जीवन’ की कविताएं कल्पना की गहराई की तस्वीरें उकेरती हैं। संकलन के संपादकों ने अपने सम्पादकीय उद्गार में पिता के भावों की अभिव्यक्ति से हृदय का स्पर्श किया है। जीवन की सच्चाई, मानवता, परोपकार और स्वयं की पीड़ा के अनुभव में जी रहे पिता को कलमबद्ध की गई संकलन की सभी कविताएं इसलिए भी अच्छी हैं कि ये मनोयोग से रची गई हैं एवं मन-संवाद करती हैं। मूल्यहीन होते समय में पितापरक कविताओं के इस संकलन हेतु संपादक-त्रय बधाई के पात्र हैं।

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पुस्तक का नाम:- पिता के साये में जीवन
संपादक:- ब्रज श्रीवास्तव
उप-संपादक:- खुदेजा ख़ान
सह-संपादक:- मधु सक्सेना
प्रकाशक:- बोधि प्रकाशन, जयपुर
वर्ष:- 2023
मूल्य:- 225/-

समीक्षक:- डॉ पंकज कर्ण

सहायक प्राध्यापक
अंग्रेज़ी विभाग
डॉ जे एम कॉलेज, मुज़फ़्फ़रपुर
मोबाइल नं – 9835018472
ईमेल- pankaj.krn12@gmail.com

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