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Category: खास कलम –

ख़ास कलम :: डॉ शिप्रा मिश्रा
खास कलम -

ख़ास कलम :: डॉ शिप्रा मिश्रा

December 22, 2022January 16, 2023

आज भी    – डॉ शिप्रा मिश्रा आज भी.. देखा मैंने उसे पानी में खालिश नमक डाल कर उसने मिटाई अपनी भूख आज भी– खाता है वह सिर्फ रात में…

ख़ास कलम :: निहाल सिंह
खास कलम -

ख़ास कलम :: निहाल सिंह

December 22, 2022January 16, 2023

आजाद परिन्दे निहाल सिंह उड़ते रहते हैं आजाद परिन्दे बेखोफ नीले गगन में जहाँ ना कोई सरहद है, ना कोई बंधन है धरा के इंसान के ज्यूॅं पाॅंवो में ना…

ख़ास कलम :: दीप शिखा
खास कलम -

ख़ास कलम :: दीप शिखा

November 10, 2022November 10, 2022

 दीपशिखा की ग़ज़लें 1 कष्ट  ये  दाल  रोटी  का  जाता  नहीं , पेट खाली हो गर कुछ भी भाता नहीं। मीर भी इस ज़माने में रहता अगर , उल्फतों  के …

ख़ास कलम :: डाॅ. अफ़रोज़ आलम
खास कलम -

ख़ास कलम :: डाॅ. अफ़रोज़ आलम

September 30, 2022September 30, 2022

ग़ज़ल क्या अजब लुत्फ़ मुझे सब्र के फल में आए जैसे नुज़हत कोई रुक-रुक के महल में आए हाय वो इश्क़ की नैरंग-ए-तमन्ना मत पूछ मस्त हो-हो के मेरी शोख़…

ख़ास कलम :: सविता राज
खास कलम -

ख़ास कलम :: सविता राज

August 7, 2022August 7, 2022

हर घर तिरंगा फहराया                       – सविता राज तिरंगा प्यारा हर घर लहराया, आजादी का अमृत महोत्सव आया। भारत की…

ख़ास कलम :: हेमा सिंह
खास कलम -

ख़ास कलम :: हेमा सिंह

August 7, 2022August 7, 2022

देश भक्ति गीत – हेमा सिंह हम रहे न रहे देश मेरा रहे ! यूँ ही आबाद मेरा तिरंगा रहे! जान है, शान है देश मेरे लिए आन है बान…

ख़ास कलम :: सीमा शर्मा मेरठी
खास कलम -

ख़ास कलम :: सीमा शर्मा मेरठी

May 24, 2022May 24, 2022

ग़ज़ल सीमा शर्मा मेरठी 1 ये जुगनू ,चाँद ,सूरज, रौशनी क्या, तुम्हारे बिन हमें देंगे ख़ुशी क्या   लड़कपन पर हँसी आने लगी अब, जवाँ होने लगी संजीदगी क्या  …

ख़ास कलम :: डॉ.सोनी
खास कलम -

ख़ास कलम :: डॉ.सोनी

April 20, 2022April 20, 2022

वो औरत…      – डॉ. सोनी  थके पांव.. मुरझाया चेहरा.. सूखे होंठ.. आंखों में छुपा.. वह दर्द गहरा.. फिर भी मुस्कुराती है.. चल रही है.. बढ रही है l…

ख़ास कलम :: नंद कुमार आदित्य
खास कलम -

ख़ास कलम :: नंद कुमार आदित्य

April 18, 2022

सपना मंजुल भावका                    – नंद कुमार आदित्य  सिलसिला    आपकी     तगाफुलका दर्द     पिंजरेमें     बन्द    बुलबुलका बागवाँ   लाख …

ख़ास कलम :: जयप्रकाश मिश्र
खास कलम -

ख़ास कलम :: जयप्रकाश मिश्र

March 17, 2022March 17, 2022

फागुनी दोहे             – जयप्रकाश मिश्र होली दस्तक दे रही, प्रेम, नेह, अनुराग। क्यों यौवन में भोगती, गोरी तुम बैराग।। जोगीरा सर रर र धूप अटारी…

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संपादकीय

संपादकीय –

 

 

संपादकीय –

कुदरत के करीब रहकर जीवन का वास्तविक आनंद लें

ठंड अपने चरम पर है। कड़ाके की इस शीत लहर में मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी भी ठिठुरते और अपनी ओट में दुबके नजर आ रहे हैं। प्रकृति का मिजाज ऐसा है कि एक ओर खेतों में पीली सरसों मुस्कुरा रही है, तो दूसरी ओर बागों में गेंदे के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं। मन का कोना-कोना इन दृश्यों को निहारना चाहता है, परंतु कड़ाके की ठंड से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक जड़ता हमें बिस्तरों से बाहर निकलने और उनके करीब जाने की अनुमति नहीं देती।
वही दूसरी ओर, इस हाड़ कपा देने वाली ठंड में देश का किसान इन सब बाधाओं से बेपरवाह है। वह कभी नंगे पैर खेतों में खाद डालता नजर आता है, तो कभी बर्फीले पानी से अपने खेतों को सींचता है। यह केवल किसान ही है, जिसे विपरीत मौसम को अपने श्रम से अनुकूल बनाने का हुनर मालूम है। जब हम रजाई में दुबककर सरसों के तेल में छनते पकौड़ों और अदरक वाली चाय का आनंद लेते हैं, तब अक्सर उस अन्नदाता को भूल जाते हैं जिसकी तपस्या से हमारी मेज सजती है।
आज का दौर दिखावे और प्रदर्शन का है। हमारी नई पीढ़ी यथार्थ की मिट्टी से दूर होती जा रही है। वे गूगल और इंस्टाग्राम पर फूलों की तस्वीरों को ‘लाइक’ करके खुश हो जाते हैं, लेकिन ओस से भीगी घास पर चलने का साहस नहीं जुटा पाते। कृत्रिम स्क्रीन ने हमें कुदरत के स्पर्श से वंचित कर दिया है। परिणाम स्वरूप, आज की पीढ़ी प्रकृति की उस ऊर्जा से कट रही है जो जीवन का आधार है।
हमें समझना होगा कि कुदरत के करीब रहकर ही हम जीवन का वास्तविक आनंद ले सकते हैं। ठंड में कोहरे की घनी चादर एक अलग ही रूहानी अनुभूति देती है। यदि आप चुपचाप उस धुंध भरी सुबह में बाहर निकलें, तो दृश्यता कम होने के कारण होने वाला ‘स्वयं के गुम हो जाने का अहसास’ मन में एक मीठी गुदगुदी और रोमांच पैदा करता है। प्रकृति हमें सिखाती है कि शांति और धैर्य क्या है। कोहरे के पीछे छिपा सूरज हमें विश्वास दिलाता है कि कठिन समय स्थायी नहीं है। अंततः, हम किस तरह कुदरत के साथ सामंजस्य बिठाकर अपनी जिंदगी को जीवंत बना सकते हैं, यह पूरी तरह हमारे अपने चुनाव पर निर्भर है।
आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!

  • डॉ भावना

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यह पत्रिका प्रत्येक महीने की एक तारीख को प्रकाशित की जाती है. कृपया रचनाएं इमेल पर भेजें. रचनाओं के मौलिक व किसी अंतरजाल पर प्रकाशित नहीं होने का प्रमाण भी संलग्न करें.
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