खास कलम : राहुल शिवाय
दोहा भूख, गरीबी, बेबसी, पीड़ा औ संत्रास। यही आज उपलब्धियाँ, कृषक-जनों के पास।। नई सभ्यता ने जने, ऐसे आज उलूक। संस्कृति के नभ पर रहे, मुख ऊपर कर थूक।। जबसे…
दोहा भूख, गरीबी, बेबसी, पीड़ा औ संत्रास। यही आज उपलब्धियाँ, कृषक-जनों के पास।। नई सभ्यता ने जने, ऐसे आज उलूक। संस्कृति के नभ पर रहे, मुख ऊपर कर थूक।। जबसे…
कुण्डलियां जिनकी कृपा कटाक्ष से, प्रज्ञा, बुद्धि, विचार। शब्द, गीत, संगीत, स्वर, विद्या का अधिकार॥ विद्या का अधिकार, ज्ञान, विज्ञानं, प्रेम-रस। हर्ष, मान, सम्मान, सम्पदा जग की सरबस। ‘ठकुरेला’ समृद्धि,…
वर्जना का दौर, इसमें प्रेम का अध्याय गढ़ना, है कठिन क्या? पर्वतों से हो गए जग के प्रणेता राह में जब, प्रेम की नदिया निकल बहती धरा की चाह में…
घिर रही हैं बदलियां अब जाने किधर घिर रही हैं बदलियां अब जाने किधर ना जाने किस देस में ठनका गिरा है किस दिशा में मेघ ने खुद…
यहाँ मिली हैं हड्डियाँ, वहाँ मिला है खून| जंगल से बदतर हुआ, बस्ती का कानून|| आखिर कब कैसे हुई, दरवानों से चूक| दूर देश से आ गई, दिल्ली में बंदूक||…
गंदगी मनकी सहेली जिंदगी उलझी पहेली हो चली सादगी सूनी हवेली हो चली योजना तो थी प्रदूषण दूर हो गंदगी मन की सहेली हो चली दोष पौधेका नहीं माली का…
न नजरें मिली न देखा जी भर यादों में बसी वह हमसफर हर डगर दो कदम जो चले मेरी परछाई वो जुदा जब हुए मेरी तन्हाई वो आंखें जब लगी…
वो लक्षमण रेखा खींची थी तुमने.. अपने मधुर सबंधों के लिये… वो आज तक ना लाँध पाई मैं… मगर रूह से रूह के सबंध को भी .. ना नाकार पाई…
1 ये समझना अधूरी हैं बातें कई उँगलियाँ हाथ की जो शरारत करें दूर हो जायेंगी मुश्किलें राह की दो क़दम ही सही साथ चलना कभी रोज़ धागे सा जलता…
मनोज अहसास की कविताएं एक कुछ जिंदगियां होती हैं सीलन भरे अंधेरे कमरों की तरह जिनके खिड़की दरवाज़े मुद्दत से बंद हैं वहां कोई भी नही जाता वहाँ घूमते हैं…