विशिष्ट कवि :: मणि मोहन
शाम शाम ढ़लते ही अपने घरों की तरफ लौट गए परिंदे आज फिर अपनी परछाईयाँ गिरा गए मेरी छत पर । बिटिया के लिए ज़िन्दगी के बीहड़ में जब कभी…
शाम शाम ढ़लते ही अपने घरों की तरफ लौट गए परिंदे आज फिर अपनी परछाईयाँ गिरा गए मेरी छत पर । बिटिया के लिए ज़िन्दगी के बीहड़ में जब कभी…
मंसूबा – श्यामल बिहारी महतो उन दिनों पत्नी के साथ मेरा भारत चीन जैसा ताना तनी चल रही थी । तभी मैने पाकिस्तान जैसा एक…
1 अपने मित्रों के लेखे- जोखे से हमको अनुभव हुए अनोखे -से हमने बरता है इस ज़माने को तुमने देखा है बस झरोखे से ज़िन्दगी से न यूँ करो बर्ताव…
फागुनी दोहे – जयप्रकाश मिश्र होली दस्तक दे रही, प्रेम, नेह, अनुराग। क्यों यौवन में भोगती, गोरी तुम बैराग।। जोगीरा सर रर र धूप अटारी…
खिड़की सिखाती हैं मुझे अंदर रहते हुए कैसे देखा जाता है बाहर – चित्तरंजन प्रगतिशील चेतना को समर्पित यह कविता एक बेचैन मनोभाव की…
1 थक गई संवेदना को पंख दे दो प्यार के खिलते कँवल कुम्हिला रहे हैं । आँख का पानी सिमटता जा रहा है अंकुरित श्रद्धा शिथिल होने लगी है समय…
बरसाणे की बावरी बरसाणे की बावरी,राधा सुंदर नाम। धवल सरीखी दूध जो,मीत मिला घनश्याम।। वनमाली यह सोचते,अलग हुआ जो रंग। हंस मिले ज्यों काग से, नहीं जँचेगा संग।। मैया जसुमति…
पंकज सुबीर की कहानियां जीवन का आईना :: अशोक प्रियदर्शी सचमुच। पंकज सुबीर की दस कहानियों का ताजा संकलन ‘हमेशा देर कर देता हूँ मैं’ मुझे मिला, तो एक-दो…
दुख आप मरे हुए लोग हैं या अधूरे आदमी क्योंकि नहीं जानते दुख । आपके पास ना होंगे- पर बहुत है दुख दुनिया में । हर कोंपल के पहले पेड़…
दुष्यंत पूर्व हिन्दी ग़ज़लकार : ज्ञानप्रकाश पाण्डेय कोई भी घटना अकस्मात नहीं घटती, उसके नेपथ्य में कोई-न-कोई प्रक्रिया बहुत पहले से चल रही होती है। ग़ज़ल का हिन्दी में आगमन…