ग़ज़लकार डॉ अनिरुद्ध सिन्हा से  कुसुमलता सिंह की बातचीत

प्रश्न –आप पिछले कई दशकों से रचनकर्म से जुड़े कवि,कथाकार आलोचक हैं । इधर कुछ वर्षों में आपने हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में मजबूत पहचान बनाई है । आपमें बहुमुखी प्रतिभा है । हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल सामानांतर विधा है या इन्हें अलग –अलग विधाएँ मानते हैं ? उत्तर –लेखन का गणित उम्र और विरासत से हल नहीं होता । हाँ भले हम ये परिकल्पना कर सकते हैं , हमारी लेखकीय उम्र क्या है ? लेखन का उत्कर्ष परिपक्वता है ।  लेखन की सामाजिक सरोकारों के प्रति क्या भूमिका…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : डॉ भावना

1 लोगों जरा तुम सुन लो रक्खो बहुत सफाई कोरोना नाम की इक चीनी बीमारी आई इक दिन दवा बनेगी ,इक दिन हम मात देंगे तब तक ये देशवासी छोड़ो जरा ढिठाई  मन कांप-कांप  जाता है देख कर ये तांडव संदेह कुछ रहा न जैविक है यह लड़ाई  हाथों को धोते रहना, चेहरे को ढक के रखना  महंगी पड़ेगी वरना तुमको ये बेवफाई मेरी ये बात मानो, बस दूरियां बना लो  जो हो, सुरक्षित रहना, खुद से करो सगाई

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लघुकथा : अरविंद भट्ट

अरविंद भट्ट की दो लघुकथाएं   रोटी एक तो दिल्ली की जून की तपती, दहकती दोपहरी और शरीर को तंदूर की तरह सेंके जा रही लू और दूसरा  भट्टी बनी यह लोकल ट्रेन. गनीमत थी कि दोपहर की वजह से ऑफिस आने-जाने वालों की भीड़ उतनी नहीं थी जितनी सुबह-शाम के समय होती है. गर्मी इतनी थी की हलक सूखा जा रहा था. गर्मी की ही सोचकर उसने ट्रेन में चढ़ने से पहले कोल्ड ड्रिंक की बोतल ले ली थी और कुछ चिप्स के पैकेट ताकि इसी बहाने गर्मी को…

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आत्मनिर्भरता : प्रशांत करण

आत्मनिर्भरता                    – प्रशांत करण     परसों ही लौकडाउन चार के समय हमारे आर्यावर्त के प्रधानमंत्री जी ने देश को सम्बोधित करते हुए आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है।सो आज चर्चा इसी आत्मनिर्भरता पर।     हमारे यहाँ आत्मनिर्भरता के कीड़े बचपन से ही हमारे शरीर में प्रवेश कर चुके हैं।बचपन से ही बच्चे अपनी पसंद-नापसन्द के फैसले लेने में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रहे हैं।स्कूल जाते समय घर से ही  किताब कॉपी के अलावे खेल के सुविधानुसार उपकरण/  सामग्री साथ ले जाते हैं।कई…

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 विशिष्ट गीतकार : वशिष्ठ अनूप

कल एक नर्स की मासूम बच्ची और एक पुलिस के मासूम बच्चे को माता-पिता के लिए तड़पते देखकर मन बहुत भावुक हो गया।महामारी से लड़ रहे ऐसे सभी डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस,प्रशासन,मीडियाकर्मियों और सफाईकर्मियों के लिए उसी मन:स्थिति में लिखा गया एक गीत- 1 तुम्हारी  कोशिशों से  ज़िन्दगी  की जंग जारी है, तुम्हारे दम से ही ख़ुशहाल यह दुनिया हमारी है।   लगा दी तुमने अपनी ज़िन्दगी इस देश की ख़ातिर, है घर-परिवार सब छोड़ा, सुखद परिवेश की ख़ातिर, कहीं   रोता   हुआ  बेटा, कहीं  बेटी  दुलारी  है।   तुम्हीं हो…

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विशिष्ट कहानीकार : माधवी चौधरी

कर्तव्य पथ                   – माधवी चौधरी कल से ही अमृत की तबीयत फिर खराब थी । नीलम परेशान क्या करे और क्या न करे। एन एम का आर्डर है कि गाँव में अगर किसी का भी रिश्तेदार बाहर से आए हों तो उसके बारे में पूरी जानकारी दें। गाँव की ‘आशा’  होने के कारण नीलम को कई बार घर से निकलना पडता। उसके क्षेत्र में दो प्रेग्नेंसी का भी केस है। हर जगह उसे ही देखना है। घर में सास- ससुर  और एक…

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‘समाजवाद या बर्बरतावाद : मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध’ : डॉ संजीव जैन

‘समाजवाद या बर्बरतावाद : मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध’ रोजा लक्जमबर्ग ने मार्क्स के अध्ययन और पूंजीवादी व्यवस्था या उत्पादन पद्धति के उनके विश्लेषण के परिणामों पर लिखते हुए यह टिप्पणी की थी कि पूंजीवाद अपने चरम विकास की स्थिति में दो ही दिशाओं में जा सकता है : समाजवाद या बर्बरतावाद। समाजवाद या बर्बरतावाद पूंजीवाद का खुला परिणाम है। यह पूंजीवाद के आंतरिक संबंधों के द्वंद्वात्मक चिंतन से खोला गया पाठ है। दरअसल जब पूंजीवाद के बीच आंतरिक रूप से संबंधित द्वंद्वी इस संबंध के प्रति आलोचनात्मक रुप से सचेत…

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विशिष्ट गीतकार : मृदुल शर्मा

1 सगुन पांखी अब नहीं इस तरफ आते।।   जि़न्दगी जकड़ी हुई है हादसों मे। खून बन कर बह रहा है भय नसों मे।   स्वस्ति-वाचक शब्द फिरते मुँह चुराते।।   हाथ खाली, पेट खाली, मन दुखी है। मुश्किलों का फूटता ज्वालामुखी है।   प्राण-पंडुक देह मे हैं  कसमसाते।।   काल की विकराल गति को थामना है। ज़िन्दगी जीते यही शुभकामना है।   दिन फिरें फिर मृदुल खुल कर खिलखिलाते।। 2 मानव की साँसों से देखो यह कैसी हो रही शरारत।।   नियमों की धज्जियां उड़ा कर बना रहे हैं…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : दिनेश प्रभात

दोस्तो! साहित्य में नौ रस होते हैं. सोचा भी नहीं था कि कभी दस वांँ भी रस होगा और उसका नाम होगा – वायरस. कविताओं में सबसे ख़तरनाक रस होता है ‘वीभत्स’. मगर ‘कोरोना वायरस’ इससे भी डरावना है. कवि को इस पर भी कलम चलानी पड़ेगी और मेरे जैसा सुकुमार कवि (प्रेमिल गीतों का रचयिता) इस दुर्दांत विषय पर भी रचना लिखेगा, यह अकल्पनीय था. बहरहाल, देश की राजधानी कह रही है, आकाशवाणी कह रही है और सावधानी कह रही है कि सिर्फ़ – बचिये. लापरवाही का इतिहास मत…

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लघुकथा : कैलाश झा ‘किंकर’

बाबूजी ठीक कह रहे हैं – कैलाश झा किंकर   ‘कोरोनटाईन सेंटर के प्रभारी के रूप में तुमने ग़लत कमाई का जो अम्बार खड़ा कर लिया है,उसे देखकर मुझे तुम्हारे पिता होने का बहुत अफसोस है।मेरे आदर्श और मेरी नैतिकता पर तुमने जो दाग़ लगाया है,उससे मैं बहुत आहत हूँ।संतोष से बड़ा कोई धन नहीं है।अपने वेतन पर गुज़ारा करना सीखो ‘ वृद्ध पिता सुखेश बाबू ने अपने पुत्र समरेश को डाँटते हुए कहा । समरेश खुशामद भरी आवाज में कहा-पिताजी, आप अपने ज़माने की बात छोड़ दीजिए।आज सब कुछ…

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