सुरेश सौरभ की दो लघुकथाएं

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 ईश्वर के लिए
उसे समझा-समझा, पक चुके थे, पर वह न मानता, कहता-बच्चे  ईश्वर की देन हैं।
नौंवीं संतान को जन्म देते वक्त जब उसकी बीवी चल बसी, तब अपनी मृत पत्नी को फटी-फटी आँखों से देख रहा था। दिल गहरी टीस से रो रहा था उसका।
  गाँव के सरपंच उसे सान्त्वना देते हुए बोले-तुम न माने? अब नतीजा देख लो। वह लम्बी आह भरते हुए बोला-ईश्वर की इच्छा.. जो हो, अब वह स्वीकार।
   सरपंच ने कस के एक तमाचा उसे जड़ा, लाल-लाल आँखे निकाल, गुस्से से बोला-यह भी ईश्वर की इच्छा।…खाने को नहीं.. स्त्री को सुरक्षित प्रसव कराने को पैसा नहीं, बड़ा आया ईश्वर को मानने वाला…सरपंच दुरदुराते हुए जा रहा था।.. गाल सहलाते, सरपंच को गुस्से से जाते  देख, फिर एकबारगी मृत पत्नी को उचटती नजरों देखा।
  अब आकाश की ओर अपने दोनों हाथ उठा कर आत्मगौरव से बुदबुदाया- हे! ईश्वर शायद तेरी यही इच्छा थी। उसके चेहरे पर कई गड्ड-मड्ड भाव आ-जा रहे थे। एक भाव ऐसा आया, जिससे उसे बेहद सुकून महसूस हुआ, वह भाव था नई शादी का। तब वह अपने दुखी मन को सान्त्वना देते हुए बोला,-ईश्वर की इच्छा का पालन करना तेरा धर्म है। तू बेवजह परेशान न हो, बावरे मन ।
पूरा मर्द
मैं परचून की दुकान पर खड़ा कुछ समान ले रहा था। मेरे बगल में, एक सज्जन और खड़े थे, सामान लेने के लिए। एक किन्नर, एक विवाहिता को लेकर सामने से गुजर रहा था।दुकानदार कुटिल मुस्कान बिखेर, बोला-स्साला…छक्का।
 प्रत्युत्तर में, मैं बोला-क्यों भाई? उसे पीछे से, गाली काहे दे रहे हो?
 “भगा लाया है, कहीं से.. छक्का है, बैनचोट और रखने चला है, पूरी औरत.. खींजते हुए दुकानदार बोला।
 तभी मेरे बगल में खड़ा वह सज्जन तैश में बोला- रे! भाई  तू किसे छक्का कह रिया है, किसे गाली दे रिया है। मोय तो, ये पूरा मर्द लागे। शराबी अय्याश आदमी ने, इस बेचारी को घर से भगा दिया। गरीब को किसी ने आसरा तो दिया।
 ‘‘मेरे को जानकारी तो यही मिली कि साले ने कहीं से पार की है, यह छमिया”, सामान तौलते, अपने हाथ रोक, दुकानदार बोला।
 ‘‘मैं कह रिया हूॅ, तो ताऊ मान ले, वर्ना चल! तुझे इसके घर ले कर चलूँ , सब मालूम हो जायेगा। बोल ताऊ अभी चलोगे ..अरे! मैं कहता हूॅ… चल..अभी चल..वह अड़ गया।
 ‘‘हें हें हें…. हो सकता मेरे को जानकारी सही न मिली हो। तुम्हारे जैसे ग्राहकों से ही यह मालूम हुआ था।’’
  ‘‘पूरी कहानी मालूम कर लिया कर ताऊ! फालतू में रायता न फैलाया कर ?’’
  मैं खामोशी से, उजबक सा खोया-खोया खड़ा था। मेरी आँखों से, वह किन्नर और उसके साथ की, वह महिला, कब की, ओझल हो चुकी थी। मैं अपना समान लेकर आगे बढ़ रहा था, तभी देखा वह दुकानदार एक किन्नर में तब्दील हो चुका है। चंद मिनट पहले मेंरे सामने से गया, वह किन्नर अब पूरा मर्द बन कर, मेरे सामने, तन कर खड़ा है। मुझ से सवाल रहा है-कुछ शरीर से किन्नर होतेे है, कुछ कर्म से, कुछ जुबान से, कुछ विचार से….ऐ! बाबू तुम लोग किसे किन्नर मानते हो?
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परिचय : सुरेश सौरभ की कई कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.
पता- निर्मल नगर लखीमपुर- खीरी उ० प्र० पिन-262701
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