प्लेकार्ड :: डॉ. गीता शर्मा

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प्लेकार्ड
        -डॉ. गीता शर्मा

“हैलो।”
“हैलो! कौन बोल रहा है?”
“जी, मैं सारंग।”
“सारंग! कौन सारंग?”
“जी, मुझे राजीव जी से बात करनी है।”
“ओह! वह तो इस समय नहीं है घर पर। मैं सुहानी बोल रही हूँ, राजीव अंकल की भतीजी। आंटी हैं घर पर, बात करवा दूँ आपकी?”
“जी नहीं, कोई बात नहीं। कृपया आप मेरा नया नम्बर नोट कर लें और राजीव जी तक मेरा संदेश पहुँचा दें।”
“जी ज़रूर।”
धन्यवाद कहकर सारंग ने फ़ोन रख दिया। अचानक हुए ट्रांसफर के कारण वह राजीव जी से मिल नहीं पाया था। फिर नए शहर और नई ज़िम्मेदारियों में ऐसे उलझ गया कि उनसे बात किए हुए एक अरसा बीत गया लेकिन आज उनके पुराने साथी से उनकी बातें सुनकर उसे उनकी याद हो आयी, तो उसने ऑफ़िस से ही कॉल किया था पर अफ़सोस, बात नहीं हो पाई। खैर… फिर वह अपने विभागीय कार्यों में व्यस्त हो गया।
सारंग भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय में अधिकारी बनकर पिछले महीने ही दिल्ली आया है। दिल्ली का अतिवादी मौसम उसे बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। ऊपर से रोज़-रोज़ के ट्रैफिक जाम बेहद थकाऊ और उबाऊ होते हैं इसलिए वह अक्सर कुछ फाइल्स रास्ते में ही देख लिया करता है। इसी तरह से काम हो जाता है और खीझ से भी बचा जा सकता है। उस दिन ऑफिस से लौटते वक़्त तेज़ बारिश शुरू हो गई। जगह जगह जल भराव और लंबा ट्रैफिक जाम। थकान के कारण कोई नई फ़ाइल देखने का मन नहीं था। वह आँख बंद करके रिलेक्स करने की कोशिश कर रहा था। एफ.एम. रेडियो पर उसका पसंदीदा गाना बज रहा था- रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन…तभी उसका मोबाइल बज उठा-
“हैलो।”
“कौन?”
“जी, मैं सुहानी।”
“सुहानी?”
“जी, राजीव अंकल की भतीजी।”
“ओह! ओके ओके। कैसे हैं राजीव सर?”
“एकदम बढ़िया और आप कैसे हैं?”
“मैं भी अच्छा हूँ।”
“अंकल कहते रहते हैं कि कैरियर गाइडेंस के लिए आपसे बात कर लूँ।”
“ये तो उनका बड़प्पन और स्नेह है।”
“नहीं सच में, अंकल इतनी तारीफ़ करते हैं आपकी। बात बात में उदाहरण देने लगते हैं कि किस तरह बाधाओं को लाँघ मेहनत और लगन से आपने ये मुकाम हासिल किया है, तो फिर मैंने सोचा कि क्यों ना बात कर ली जाए आज आपसे।” सुहानी ने झिझकते हुए कहा। उसकी घबराहट उसकी आवाज़ से साफ़ झलक रही थी।
“बहुत अच्छा किया आपने।” अनायास बोल दिया उसने। फिर बात संभालते हुए पूछा “क्या करती हैं आप?”
“मैं ट्राइबल आर्ट एंड क्राफ्ट में डील करती हूँ।”
“अरे वाह! बहुत सुंदर।”
“मुझे बचपन से ही ये सब बहुत भाता था, तो उसी को प्रोफेशन भी चुन लिया। फाइन आर्ट्स में मास्टर्स किया है, तो बस वही कुछ करती रहती हूँ।”
“अरे! ये तो बहुत अच्छी बात है। आख़िर कितने लोग हैं जो अपने शौक़ को ही अपना प्रोफेशन बना पाते हैं?”
“हाँ सो तो है लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
“बहुत स्ट्रगल है इस फील्ड में। पहचान बनाने में ही जीवन खप जाता है। बिना पहचान के कोई नहीं पूछता फिर बहुत फ़ायदेमंद भी नहीं है।”
“पर आत्म संतोष तो है?”
“हाँ, फिर भी…कई बार सोचती हूँ कि अपना प्रोफेशन बदल लूँ। आप गाइड करिए।”
दोनों बहुत देर तक गंभीर बात करते रहे पर बीच बीच में हँसते भी रहे। घर पहुँचकर ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, तो बातचीत का दौर ख़त्म हुआ, इस वादे के साथ कि वे बातें करते रहेगे। सारंग को आज ऑफिस में अतिव्यस्त और ऊब भरे दिन के बाद भी, घर पहुँचने पर बिल्कुल थकान महसूस नहीं हो रही थी। बल्कि मन में एक गुदगुदी सी हो रही थी, जैसे हल्के हल्के से बादल उड़ रहे हो उसके मन के आकाश में। अभी भी हल्की हल्की बारिश हो रही थी और उसके पुलकित मन में अभी तक बस वहीं गाना गूँज रहा था। वह अनायास गुनगुनाने लगा-
“महफ़िल में कैसे कह दें किसी से
दिल बँध रहा है एक अजनबी से”
सुहानी से हुई इस शाब्दिक मुलाकात से सारंग बहुत प्रभावित हुआ था। वह उसकी आवाज़ सुनने के लिए एक खिंचाव महसूस करने लगा था। सुहानी भी जैसे उसके कॉल के इंतज़ार में ही रहती और कभी ख़ुद से ही कॉल कर लिया करती। फिर तो जैसे नियमित बातचीत का एक सिलसिला शुरू हो गया। उसने महसूस किया कि दोनों के इन्ट्रेस्ट काफ़ी मिलते हैं और इसी कारण उनकी बातचीत काफ़ी सहज और स्वाभाविक सी होती है।
एक दिन बातों बातों में सारंग ने अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनाई, तो सुहानी चौंक गई। “अरे वाह! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। तो कविताएँ भी लिखते हैं आप?” उसने आश्चर्य करते हुए कहा। “और क्या क्या कर लेते हैं आप? ऑलराउंडर हैं आप तो, तभी अंकल आपकी इतनी ज़्यादा तारीफ़ करते रहते हैं।”
“अरे नहीं, बस यूँ ही कुछ लिख लेता हूँ, जब भी अकेला होता हूँ। कविताएँ मेरे अकेलेपन को बाँट लेती हैं। मेरी तनहाई की हमसफ़र हैं मेरी कविताएँ।”
“बहुत सुंदर लिखते हैं आप, सच में। ऐसा करिये, आप अपनी कविताएँ मुझे भेज दीजिए। मैं उन्हें कैनवास पर उतार दूँगी। After all painting is poetry with colours.”
“ओह! बहुत सुंदर बात कही आपने, आपका हार्दिक आभार।”
“प्लीज़, ये मेरे लिए सौभाग्य होगा।”
“ओके ठीक है। मैं आप तक पहुँचाने की कोई व्यवस्था करता हूँ।”
“और मैं एक एग्ज़िबिशन लगाती हूँ फिर।” दोनों ज़ोर से हँस पड़े।
“वाह! एग्ज़िबिशन के नाम से याद आया कि हमारा संस्कृति मंत्रालय भी एक राष्ट्रीय प्रदर्शनी आयोजित कर रहा है। आप चाहें तो आपके लिए भी स्टॉल बुक कर देता हूँ।”
“अरे, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ मैं कहाँ…”
“ये क्या बात हुई भला? कलाकार अच्छा या बुरा तो हो सकता है, पर छोटा या बड़ा नहीं होता। हर कलाकार कला का साधक होता है। फिर सोचिए, इसी से तो पहचान मिलेगी आपको।”
“ठीक है, यदि आपको यह उचित लगता है तो…”
“तारीख़ तय होते ही आपको बता दूँगा पर आप तैयारी तो शुरू कर दें।”
पंद्रह दिसम्बर से विविध कला प्रदर्शनी लगनी है, सारंग ने उसे बता दिया था।
दोनों ही अपने अपने कामों को पूरा करने में लगे हुए थे। समय पंख लगाकर उड़ रहा था। फिर एक दिन सुहानी ने अपने आने की सूचना देने के लिए सारंग को फ़ोन किया।
“मैं 14 सुबह की फ्लाइट से दिल्ली पहुँच रही हूँ। आप मुझे रुकने ठहरने का पता नोट करवा दीजिए।”
“अरे वाह, ये क्या बात हुई? आप आ रही हैं हमारे यहाँ। हमारी आधिकारिक अतिथि हैं आप। मैं आता हूँ आपको रिसीव करने।”
“नहीं, ऐसी किसी औपचारिकता की आवश्यता नहीं है। मैं टैक्सी ले लूँगी।”
“औपचारिक तो आप हो रही हैं।” फिर कुछ रुक कर उसने कहा,
“आप चाहें तो मैं भी आ सकता हूँ, बिना किसी औपचारिकता के।”
“ठीक है, पर आप मुझे पहचानेंगे कैसे?”
“उसकी चिंता आप ना करें। मैंने आपको इतना तो जान ही लिया है कि आपको पहचान सकूँ।” बात को ख़त्म करते हुए उसने कहा।
सारंग पूरे दिन बस सुहानी को लेकर प्लान बनाता रहा कि वे लोग कहाँ-कहाँ सहजता से जा सकते हैं और कहाँ उसे परेशानी हो सकती है। अगली सुबह बहुत ही खुशगवार थी। सारंग का मन इस बहुप्रतीक्षित मुलाक़ात के बारे में सोच कर ही रोमांचित था। सुहानी की फ्लाइट दोपहर में आने वाली थी। वह तैयार होकर समय से पूर्व ही एयरपोर्ट पहुँच गया था। एयरपोर्ट पर ड्राइवर ने गाड़ी में से निकालकर सामान उसे पकड़ा दिया। एक हाथ में सुहानी की पसंद के फूलों का गुलदस्ता और दूसरे में उसके नाम का प्लेकार्ड लेकर वह आगमन द्वार पर मानों आँखें बिछाए उसकी प्रतीक्षा करने लगा। प्लेकार्ड तो उसने ख़ुद ही तैयार किया था। फ्लाइट को आए हुए समय हो चला था। उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। बिल्कुल नई तरह की अनुभूति हो रही थी। टीनएजर्स के जैसा उतावलापन, जिसके बारे में वह स्वयं भी अब तक अनजान था। पैसेंजर बाहर निकलने लगे थे और सारंग निकासी द्वार पर टकटकी लगाए देख रहा था। उसकी नज़र बाहर निकलकर आने वाले हर यात्री से जा टकराती पर उसे किसी में भी सुहानी की छवि दिखलाई नहीं दी।
“कब आयेगी वह?” उससे मिलने की उत्सुकता उसे अधीर और बेचैन कर रही थी। समय बीतता गया पर सुहानी नहीं आई। चिंतातुर होकर उसने उसे कॉल किया पर कॉल भी नहीं लग रहा था। वह बेतहाशा बस कॉल किए जा रहा था पर हर बार यही सुनाई देता कि आप जिसे कॉल करने की कोशिश कर रहे हैं, वह आपकी पहुँच से दूर है। उसका मन नहीं मान रहा था। वह तो बस सुहानी को कॉल किए जा रहा था। हताशा निराशा बढ़ती जा रही थी। इस अप्रत्याशित परिस्थिति के लिए तो वह तैयार ही नहीं था। उसने कन्फर्म किया कि सारे यात्री निकल चुके थे। अब क्या किया जा सकता है। उसकी आँखें तो अभी भी उसी को ढूँढने के जतन में हर आगंतुक तक पहुँच जाती और फिर गहरी निराशा ओढ़े लौट आती। काफी समय बीत चुका था और अधिक प्रतीक्षा निरर्थक ही प्रतीत हो रही थी पर अब भी उसका मन लौटने को तैयार नहीं था।
“आखिर सुहानी ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या उसे मेरे बारे में पहले से पता नहीं था? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने मुझे व्हील चेयर पर देखकर मुझे पहचानना ही ना चाहा हो? क्या जानबूझकर उसने ऐसा किया है? पर राजीव सर को तो मेरे बारे सब कुछ पता था और उन्होंने ज़रूर बता दिया होगा मेरे बारे में। फिर ऐसा क्या हुआ? उसने तो…”
उसे ख़ुद पर ही गुस्सा आ रहा था कि उसने किस तरह के लुभावने भ्रम पाल लिए थे। वह मुग़ालते में ही रहा, तभी तो… क्या वह सारी बातें छलावा थीं? वह जितना सोचता, उतना ही अधिक संदेह के दलदल में धँसता चला जाता। करे भी तो क्या करे वह? शाम ढल चुकी थी और बीतता हर पल आशंकाओं के अँधेरे लिए रात को और स्याह बना रहा था। उसे लगने लगा कि और इंतज़ार करना व्यर्थ ही है। आखिरकार भारी मन से फूल और प्लेकार्ड वहीं फेंककर, वह घर लौट आया। फिर बिना खाना खाए वह बिस्तर पर लेट गया लेकिन नींद को ना तो आना था और ना ही आई। पूरी रात बस एक ही बात चुभ रही थी कि आख़िर सुहानी ने ऐसा क्यों किया होगा?
अगले दिन सुबह से ही मौन पड़े फ़ोन को देखता रहा और मन ही मन उसके बज उठने की बढ़ती तीव्रता के आगे बेबस रहा। उसने सारे संपर्क सूत्र खंगाल लिए पर कहीं से भी कुछ पता नहीं चल सका। अब उसकी शंका बलबती हो चली थी कि सुहानी का उससे संपर्क ना करना, उसका एक सोचा समझा निर्णय है। अगर ऐसा है तो फिर उसे क्या करना चाहिए? इसी उधेड़बुन में सारंग अपने को अनिर्णय के भंवर में फँसा हुआ महसूस करने लगा। उसे भी प्रदर्शनी स्थल पर जाना था पर क्षोभ और पीड़ा से बोझिल मन ने उसे जकड़ लिया था। उसने तबीयत ठीक ना होने का कहकर अवकाश ले लिया। दरअसल वह सुहानी के सामने पड़ना ही नहीं चाहता था। उसने सोचा यदि वह सुहानी से प्रेम करने लगा है, तो उसे उसके इस निर्णय का सम्मान करना चाहिए। कोई लड़की क्यों पसंद करेगी उसके जैसे व्यक्ति को अपने जीवन साथी के रूप में? उसे यह सब समझना चाहिए और बुरा नहीं लगना चाहिए पर वह अपने मन को नहीं समझा पा रहा था, जो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि सुहानी ऐसा कर सकती है। फिर सोचा, शायद यही अच्छा होगा सुहानी के लिए भी कि वह उससे बिल्कुल अलग हो जाए हमेशा हमेशा के लिए। फिर अलग हो जाने से प्रेम थोड़े ही ख़त्म हो जाएगा…जैसे कृष्ण और राधा का प्रेम। ऐसा सोचकर ही उसकी आत्मा काँप उठी पर इस तरह… बिना मिले… उसे एक कोशिश ज़रूर करनी चाहिए। आख़िर वजह पता भी तो चले।
“क्या वजह पता नहीं है तुम्हें?” उसके मन ने प्रश्न किया। “क्यों जानकर भी अनजान बन रहे हो? उसके भी कुछ सपने होंगे और तुम उसके सपनों के राजकुमार नहीं हो सकते और ये भी तो संभव है कि वह तुमसे प्यार करती ही ना हो। जो भी हो, अब तुम्हें उससे उसके निर्णय के साथ जीने के लिए छोड़ देना चाहिए।”
पीड़ा इतनी अधिक थी कि वह सह नहीं पा रहा था। भावावेश में आकर उसने तुरंत अपने घर जाने का निर्णय ले लिया और अगली फ्लाइट से निकल भी गया। वह जल्दी से जल्दी इस रिजेक्ट कर दिए जाने की हीन भावना से दूर होना चाहता था। बिना किसी पूर्व सूचना के घर पहुँचते ही, उसके परिवार वाले, ख़ुश होने से अधिक तो हतप्रभ थे।
“यूँ अचानक? सब ठीक तो है?” उसके पिताजी ने पूछा।
“क्यों? क्या मैं अपने घर भी नहीं आ सकता हूँ?”
“अरे नहीं, ये बात नहीं है। हम तो कितने दिनों से तुम्हारी बाट जोह रहे थे? अच्छा किया जो आ गए।”
“उसे क्यों परेशान कर रहे हैं आप? देखते नहीं कितना थका हुआ लग रहा है?” माँ ने पिताजी को टोकते हुए कहा।
“अच्छा बताओ, अब कुछ दिन तो रहोगे ना हमारे साथ?”
“हाँ, आप जब तक चाहें, रुक जाऊँगा।” अप्रत्याशित उत्तर था सारंग का, वरना वह तो रोकने पर भी कभी नहीं रुका। उसकी खीझ उसके चेहरे पर ठहर गई थी। बातचीत में उसकी दिलचस्पी नहीं थी। “थक गया हूँ, थोड़ा सो लेता हूँ।” कहते हुए वह अपने कमरे में आ गया।
रात को खाना खाते समय माँ ने डरते हुए कहा, “एक बहुत अच्छा रिश्ता आया है। तुम कहो तो बुलवा लें उन्हें। तुम्हारे आने का ही इंतज़ार कर रही थी मैं। लड़की से मिल लो। पसंद आ जाए, तो चट मंगनी पट ब्याह।”
हालाँकि वह जानती थी कि शादी की बात करते ही सारंग का मूड अपसेट हो जाता है पर माँ का दिल उसकी गृहस्थी बसते देखना चाहता है। माँ के एकालाप पर सारंग चुप ही रहा।
“अरे कुछ तो बोलो। अच्छा परिवार है। मैंने लड़की देख ली है। बहुत सुंदर और समझदार है। मैंने सब बता दिया है और उसे कोई आपत्ति नहीं है।”
“वो जानती है और फिर भी तैयार है?” उसने चिढ़ते हुए कहा।
“क्यों तैयार नहीं होगी? क्या कमी है मेरे बेटे में? कोई भाग्यशाली ही होगी जो तुम्हारी जीवन संगिनी बनेगी।”
“आप माँ हो ना इसलिए आपको कोई कमी नज़र नहीं आती, वरना कौन देना चाहेगा अपनी बेटी मुझ जैसे… और लड़कियों के सपनों के राजकुमार घोड़े पर बैठकर आते हैं, यूँ किसी व्हीलचेयर पर बैठकर नहीं।”
सारंग के अनुभव की कड़वाहट उसके शब्दों में उतर आई थी।
“अरे बताया तो अभी कि सब राजी हैं। बस तुम दोनों मिल लो एक बार। बहुत कठिन दौर से गुजरी है केतकी। बड़ी मुश्किल से जान बची है उसकी। सुसराल वालों ने तो…उसके चेहरे पर उभर आए सफेद दाग़ के आगे उसकी योग्यता हार गई।” माँ ने गहरी साँस लेकर कहा। उसने माँ की ओर देखा।
“हाँ बेटा, मैं चाहती हूँ कि तुम कम से कम मिल तो लो एक बार।”
सारंग की मनस्थिति कुछ भी निर्णय लेने की नहीं थी। वह ‘देखते हैं’ कहकर अपने कमरे में आ गया। रात बेचैनी भरी रही और आँखें बोझिल। दिन भर की इतनी अधिक थकान के बाबजूद वह सो न सका। इस रिजेक्शन के लिए कभी ख़ुद को तो कभी सुहानी को दोषी मान रहा था। उसने राजीव सर को कॉल किया कि शायद वह कुछ बता सकें पर अफ़सोस उनका फ़ोन भी आउट ऑफ़ ऑर्डर था, तो बात नहीं हो पाई पर टूटा बिखरा मन जैसे उसके बस में नहीं था। उसकी समझ ने उसका साथ छोड़ दिया था। अनजाने अनचाहे उसकी उंगलियाँ सुहानी के नंबर डायल करने के लिए बेताब सी इधर-उधर घूम रही थीं पर इस बार भी कॉल नहीं लगा। उसे कम से कम फ़ोन तो करना चाहिए था। क्या इतनी कर्टसी भी नहीं है? इस बेरुखी पर खीज, गुस्सा और दर्द का अहसास असहनीय था। देर सुबह तक वह अपने कमरे में ही रहा। आज उठने की कोई वजह भी तो नहीं थी।
“क्यों, आज उठना नहीं है क्या?” माँ की आवाज़ आई।
“जल्दी से तैयार होकर आ जाओ तुम्हारी पसंद का नाश्ता तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। हम लोग भी बैठे हैं बिना नाश्ता किए।”
“आता हूँ माँ पर आप लोग तो नाश्ता कर लें।”
ना चाहते हुए भी वह तैयार होकर टेबल पर आ गया।
“हम लोग आज उनके घर जा रहे हैं लड़की देखने। मैंने उन्हें बता दिया है कि तुम आए हुए हो।”
“अरे माँ! आप भी ना। सुबह सुबह फिर वही पुराना राग लेकर बैठ गईं।”
“इस बार मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाली। टाइम पर तैयार हो जाना।”
शाम का समय तय किया गया था पर सारंग अभी तक कमरे से बाहर नहीं आया, तो माँ की आवाज़ आई-
“जल्दी करो सारंग! किसी को इस तरह प्रतीक्षा करवाना ठीक नहीं लगता।”
बड़े बेमन से ही वह साथ हो लिया। लड़की वाले बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। बहुत सम्मान के साथ आवभगत में जुट गए। टेबल पर चाय नाश्ता लग चुका था और अनुनय विनय चल रहा था, तभी केतकी ने एक चिर परिचित सी मुस्कान के साथ कमरे में प्रवेश किया। इधर उधर की बातें, हँसी मज़ाक चलता रहा।
फिर माँ ने कहा, “अरे भाई हमें बच्चों को भी समय देना चाहिए ताकि ये लोग आपस में बातें कर सकें।”
“हाँ हाँ क्यों नहीं?” केतकी के पिता बोले।
“केतकी तुम सारंग को अपने कमरे में ले जाओ।”
“जी पापा।”
“आइए आपको अपने स्टडी में ले चलती हूँ।” केतकी ने सारंग की व्हील चेयर को आगे बढ़ाते हुए कहा।
वे लोग एक दूसरे की पसंद नापसंद पूछते रहे। सारंग यह सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि केतकी इस रिश्ते के लिए मन से तैयार है और किसी तरह के दबाव में या हताशा में आकर तो यह निर्णय नहीं ले रही इसलिए उसने
पूछा-
“आप अपनी मर्ज़ी से ही हाँ कर रही हैं?”
“जी हाँ, क्यों? आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?
मैंने किसी के कहने पर यह निर्णय नहीं लिया है बल्कि कॉलेज के दिनों से ही आपके प्रति एक लगाव महसूस किया करती थी पर कभी ज़ाहिर करने का मौका नहीं मिला।”
“कॉलेज के दिनों से? मतलब? पर मैं तो आपको पहचानता तक नहीं।”
“कैसे पहचानेंगे? मैं दो साल जूनियर थी आपकी। आप तो हमेशा से ही मेरिट होल्डर थे। जब भी आपको गोल्ड मेडल मिलता था, तो मुझे बहुत अच्छा लगता था। असेंबली में आपकी कविताएँ सुना करती, तभी से मैं आपसे बहुत प्रभावित थी!” वो एक ही साँस में बोल गई।
“ओह! तो ये बात है। तभी माँ बोल रही थी।” उसने सोचा।
“क्या आपको सच में इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं है कि मैं आपकी कल्पनाओं के जीवन साथी जैसा बिल्कुल नहीं हूँ?”
“जी नहीं, मुझे कोई ऐतराज़ क्यों होगा?
“अरे लड़कियों के सपनों में राजकुमार अलग होते हैं शायद।”
“वो तो मुझे पता नहीं पर मेरे मन में साथी का जो अक्स है, उसकी शक्ल ज़रूर आप जैसी ही है।” कहकर वह मुस्करा दी और फिर गहरी साँस लेकर बोली,
“कल्पना का जीवन साथी… मुझे कल्पनाओं में भरमाने वाला नहीं, यथार्थ में हाथ थामने वाला साथी चाहिए। वैसे भी कल्पनायें आपके प्रेम से ही रंगी हुई होती हैं। आपके प्रेम के बिम्ब की प्रतिबिंब, है ना? प्रेम कल्पना नहीं होता, वह यथार्थ होता है। हमारी कल्पनायें हमारे प्रेम की ही उपज हैं। जो यथार्थ में नहीं मिलता, उसे कल्पनाओं में ढूँढता रहता है हर कोई। जहाँ भी हमारी कल्पनाओं, हमारे सपनों को धरातल पर स्वागत करता यथार्थ मिल जाता है, वहाँ खुशियों के फूल खिलना तय है, वरना तो सपने बिखरने के दंश झेलना नियति बन जाती है।”
वह बोलती रही, “जब आपका रिश्ता आया, तो मैंने पापा को अपनी स्वीकृति पहले ही दे दी थी।”
फिर धीर गंभीर अंदाज़ में बोली- “सारंग जी! आप जानते हैं ना कि कृष्ण हमेशा से राधा को चाहते रहे और मीरा कृष्ण को… एकतरफ़ा… तभी तो मीरा का अपने प्रेम पर विश्वास जीत गया और कृष्ण मीरा के प्रेम के आगे विवश हो गए। फिर मीरा के गिरिधर गोपाल बन गए। मैं किसी की राधा तो नहीं बन सकी पर मुझे अपने प्रेम पर विश्वास था, अटूट विश्वास…”
यह कहकर केतकी रुक गई और सारंग के सारे तर्क भी पराजित हो चुके थे। उसकी सारी शंकाओं को अपने सौम्य तर्कों से केतकी ने नकार दिया था और उसे लगा जैसे उसके दिल की जलन पर किसी ने चंदन का लेप कर दिया हो। काफी समय हो चला था। वह दोनों भी परस्पर स्वीकृति के साथ एक मृदु स्मित लिए ड्रॉइंग रूम में आ गए। उनके चेहरे बता रहे थे कि सारंग और केतकी, दोनों ने ही एक दूसरे को पसंद कर लिया है।
“अब हमें चलना चाहिए” सारंग और केतकी की ओर देखते हुए सारंग की माँ ने कहा।

“जी कैसी लगी आपको हमारी बेटी?” केतकी की माँ ने सारंग से पूछ ही लिया।
दोनों एक दूसरे को देखते हुए मुस्करा दिए। उनकी ये मुस्कान मानों विस्तारित होकर हर किसी के चेहरे पर चिपक गई। उनके हाँ करते ही मुँह मीठा कराने की होड़ सी लग गई। सारंग की माँ ने अपने कंगन केतकी को पहनाते हुए कहा,
“हमारे बेटे के जीवन में तुम्हारा हार्दिक स्वागत है केतकी।”
घर पहुँच कर माँ तो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहीं थीं। पापा भी बहुत निश्चिंत दिख रहे थे पर सारंग अभी भी असमंजस में था कि कहीं ये निर्णय क्रोध में आकर तो नहीं ले लिया। ज़िन्दगी अक्सर दोराहे पर ले आया करती है। हमारा चयन ही हमारा भविष्य, हमारी ज़िन्दगी में आने वाले मोड़ों को भी तय कर देता है। सारंग इस समय स्वयं को ऐसे ही दोराहे पर खड़ा हुआ महसूस कर रहा था। इससे पहले कभी भी अपने निर्णय पर इतना संशय नहीं हुआ था। किंकर्तव्यविमूढता की यह स्थिति असहसीय थी। वह इससे जितना जल्दी हो, बाहर निकल जाना चाहता है। ज़िन्दगी के इस अवांछित विकल्प दुविधा से बचना है तो उसे एक रास्ते का चयन करना ही पड़ेगा। क्या ज़िन्दगी जिधर ले जा रही है उधर ही मुड़ जाया जाए? सलोनी और केतकी के लिए भी यहीं अच्छा होगा। और उसके ख़ुद के लिए? शायद… ख़ुद के लिए क्या अच्छा होगा? पर पुनर्विचार की ना तो कोई इच्छा थी और ना ही कोई गुंजाइश। ज़िन्दगी अब एक अप्रत्याशित मोड़ ले चुकी थी और अब पीछे मुड़कर देखना दुख और निराशा ही देगा, सो मूव ऑन…माँ की रट, चट मंगनी पट ब्याह से हट ही नहीं रही थी।
“अब तो शादी करके ही जाना यहाँ से तुम दोनों।” माँ की ज़िद के आगे उसकी एक ना चली, तो ताबड़तोड़ सारे इंतज़ाम कर लिए गए और एक सादगी भरे समारोह में सारंग और केतकी ने अपना हाथ और जीवन एक दूसरे को सौंप दिया। परिणय सूत्र में बंध सारंग और केतकी दिल्ली आ गए। आज भी बारिश हो रही थी। बेमौसम की बारिश मानों नव दंपत्ति को अपना शुभाशीष दे रही थी। घर पहुँचकर केतकी डिनर की तैयारी में जुट गई और सारंग भी अपने कमरे को थोड़ा व्यवस्थित करवाने लगा। टेबल के नीचे पड़े प्लेकार्ड को देख वह एकदम जड़ हो गया। ठंड में भी पसीने से भीग गया।
“अरे! ये यहीं पर छूट गया था, तो उस दिन? उस दिन उसके हाथ में कौन सा, किसके नाम का प्लेकार्ड था?”
उसका शरीर काँपने लगा। दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। इतनी ज़ोर से कि तेज़ धड़कन की आवाज़ उसके कानों को चीर रही थी। अति उत्साह में उसने देखा तक नहीं कि किसी और के नाम का प्लेकार्ड हाथ में लिए खड़ा था। सुहानी तो संपर्क कर सकती थी किंतु उसका फ़ोन तो आउट ऑफ रीच था। मतलब? क्या हुआ होगा? प्रश्न के इतने सारे उत्तर प्रतिउत्तर करता उसका मन गहरी उदासी में डूब रहा था। उसे लगा जैसे वह किसी गहरी तलहटी में धँसता जा रहा है। लगा कि जैसे उसकी साँसें थम गई हैं। वह वहीं पड़ी कुर्सी पर गिर पड़ा और उसने महसूस किया कि सुहानी की काल्पनिक छवि प्लेकार्ड से निकलकर वहाँ टहलती हुई दिख रही थी। सुहानी के हाथ में कई सारे प्लेकार्ड्स थे। वह उसके सामने से गुज़र रही थी, एक के बाद एक प्लेकार्ड लहराते हुए। प्लेकार्ड्स, जिन पर उसकी कविताओं के बेहद खूबसूरत चित्रांकन उकेरे हुए थे। एक प्लेकार्ड, जिस पर सिर्फ़ प्रश्न चिह्न था, मानों वह पूछ रही हो-
“आखिर क्यों सारंग? मुझ पर नहीं पर ख़ुद पर तो विश्वास करते सारंग। अपने प्रेम पर विश्वास करते, विकलांगता देह की कमी से नहीं होती। वास्तव में आत्मविश्वास में कमी ही असल मायनों में विकलांगता होती है सारंग। तुमने अपना आत्मविश्वास इतनी आसानी से कैसे खो दिया? तुम नहीं, शायद तुम्हारा अपने प्रेम पर विश्वास अपंग था। सारंग! तुम्हारा प्रेम अपंग था।”

………………………………………………………………………….

परिचय : डॉ.गीता शर्मा की एक काव्य और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अलावा विविध साझा संकलनों में भी इनकी रचनायें आयी हैं. इन्हें महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान, अमृता प्रीतम कवयित्री सम्मान सहित कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं

संप्रत्ति : माता जीजाबाई शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, इंदौर में प्राध्यापक
संपर्क : 433, ‘वृंदावन’ माउंट वर्ग, नायता मुंडला, बायपास रोड, इंदौर, पिनकोड – 452020 मध्य प्रदेश
मो. : 9425065540
मेल आईडी : dr.geetapraveen@gmail.com

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