खास कलम :: सत्यशील राम त्रिपाठी के दोहे

यहाँ मिली हैं हड्डियाँ, वहाँ मिला है खून| जंगल से बदतर हुआ, बस्ती का कानून|| आखिर कब कैसे हुई, दरवानों से चूक| दूर देश से आ गई, दिल्ली में बंदूक|| कैसा ये विश्वास है, कैसा है अनुबंध| सात भाँवरो ने गढ़े, जन्मो के सम्बन्ध|| जो भूखों की चीख का, नही जानता मर्म| आखिर वो कैसे करे, जनहित कारी कर्म|| सिखा रही है कृषक को, मालिक की हर बेत| भूखे सोना ठीक है, नही जोतना खेत|| आया है परदेश से, मेरे मन का राम| घर मन्दिर जैसा हुआ, हृदय अयोध्या धाम||…

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पुस्तक समीक्षा :: डॉ सपना तिवारी

वर्तमान यथार्थ का : ‘अनकही अनुभूतियों का सच’ वस्तुतः काव्य मानवीय संवेदना की भावाभिव्यक्ति है, जिसमें समग्र यथार्थ के साथ तदात्म्य स्थापना की प्रक्रिया चलती रहती है। कविता का काम है लोगों में चेतना को जगाना। कविता ही मानव जीवन के यथार्थ से जुड़कर मानवीय चेतना और आत्मा का नवनिर्वाण करती है। बावन विभिन्न विषयों के सारगर्भित कलेवर से सजा ‘अनकही अनुभूतियों का सच’ काव्य संग्रह अरविंद भट्ट का प्रथम काव्य संग्रह है। उनके प्रथम काव्य संग्रह को पढ़कर यह कतई महसूस नहीं होता कि संग्रह की कविताओं का सृजन…

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विशिष्ट कहानीकार :: सिनीवाली शर्मा

अफसर की बीबी मोबाइल की घंटी बजते ही रसोई से भुनभुनाती हुई कामिनी निकली, ” कितनी बार कहा इनसे एक नया मोबाइल ले लो, लेकिन हर महीने कहेंगे अगले महीने ! पता नहीं वो महीना कब आएगा !” उसकी उंगली यंत्रवत मोबाइल के घिस चुके बटन पर चली गई। ” हलो ” ” पहचानी !” ” आं—नहीं—कौन—?” ” मैं साँवली ” ” सां…वली…तुम !” उसकी आवाज सुनकर कामिनी के भीतर खुशी की लहर दौड़ गई। ” इतने दिनों के बाद ?” ” तुम तो मुझे भूल ही गई पर मैं…

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विशिष्ट गीतकार :: शुभम् श्रीवास्तव ओम्

एक चिड़िया फड़फड़ाती अब असम्भव हो रहा है इस व्यथा को शब्द देना रील में उलझे हुए पर एक चिड़िया फड़फड़ाती। उँगलियों के पोर में कुछ काँच के जैसा करकता देखती है आँख दिन में कुछ धुँए जैसा उतरता सामने हैं पुल धसकते और ट्रेनें धड़धड़ाती।। एक ईशारे पर हुए पथराव घायल छत- मुँडेरे बढ़ रहीं लपटें सुबह की ओर यूँ आँखे तरेरे नींद खुल जाती अचानक और खिड़की खड़खड़ाती। जीवन में गीतों का होना जीवन में गीतों का होना चाहे मुश्किल हो, गीतों में जीवन का होना बहुत जरूरी…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : कृष्ण कुमार प्रजापति

1 खुलके हँसना – मुस्कुराना आ गया हमको भी अब ग़म छिपाना आ गया दोस्त भी दुश्मन नज़र आने लगे जाने कैसा ये ज़माना आ गया जब चमन में टूट कर बिजली गिरी जद में अपना आशियाना आ गया चोट सह लेने की हिम्मत आ गयी दर्द में भी गुनगुनाना आ गया आँधियों से कह दो मैं डरता नहीं अब मुझे भी घर बनाना आ गया इक जवानी आप पर क्या आ गयी हर किसी से दिल लगाना आ गया ये तो उसकी मेहरबानी है “कुमार” शेर कहना , गीत…

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विशिष्ट कहानीकार : अमरेंद्र सुमन

खामोशी चार अलग-अलग कंधों के सहारे बेजान एक जवान युवक को शहर के मुख्य अस्पताल की ओर ले जाया जा रहा था। विकट उष्णता भरी रात में भी आने वाले कल की चिंता से बेपरवाह शहर कुंभकर्ण की भांति खर्राटे ले रहा था। विरान सड़क रोज की भांति आज भी अपने अकेलेपन से बातें करने में मशगूल था। यदा-कदा गली के कुत्ते भोजन की तलाश में रास्ता सुंघते हुए दिख जाया करते थे। पुलिस महकमें की चलन्त गाडियां कभी-कभार ही रास्ते की शोभा बढ़ा पा रही थीं। विद्युत विभाग जैविक…

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खास कलम : नंद कुमार आदित्य

गंदगी मनकी सहेली जिंदगी उलझी पहेली हो चली सादगी सूनी हवेली हो चली योजना तो थी प्रदूषण दूर हो गंदगी मन की सहेली हो चली दोष पौधेका नहीं माली का था नीम की साथिन करेली हो चली मानिनी अवमानना है झेलती लालसा जबसे रखेली हो चली शिष्टता को दर्द की दौलत मिली स्वामिनी खाली हथेली हो चली कोकिला के पंख कुतरे जा रहे सिर छुछुंदर के चमेली हो चली ठेस देकर देश के विश्वास को जब विदेशी रंगरेली हो चली रुपजीवा क्या निगोड़ी सिर चढ़ी हिंद में हिंदी अधेली हो…

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विाशिष्ट कवि : सलिल सरोज

1 ये सड़क कहाँ जाती है इसके उत्तर भी कई हैं और मायने भी कई हैं एक तो यह सड़क कहीं नहीं जाती बस अपने पथिकों का सफर देखती है और मंज़िल मिलते ही उसको आँखें मूँद लेती है। दूसरा तो यह सड़क पथिक की सहगामी है आरम्भ से गंतव्य तक की परिणत आगामी है। पर क्या सड़क के बस इतने ही मायने हैं क्या यही क्या सड़कें सभ्यता का मार्ग प्रशस्त नहीं करती समाज को अभ्यस्त नहीं करती कुछ नियम से, कुछ कायदों से कुछ तरक्की से, कुछ फायदों…

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पारंपरिक जनजातीय लोक कला सोहराई – कुमार कृष्णन

पारंपरिक जनजातीय लोक कला सोहराई – कुमार कृष्णन झारखंडी संस्कृति में सोहराई कला का महत्व सदियों से रहा है। बदलते परिवेश में कथित आधुनिकता के नाम पर लोगों का शहरीकरण के कारण आज दुर्भाग्यवश इस कला के प्रति उपेक्षाभाव, इसके अस्तित्व पर संकट बनकर आ खड़ा हुआ है। आधुनिकीकरण और शहरीकरण के कारण आज की नई पीढ़ी इस प्रागैतिहासिक कला को पिछड़ेपन का प्रतीक मानकर नकार रही है। राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सोहराई पर्व के दौरान दुधि माटी से सजे घरों की दीवारों पर महिलाओं के हाथों के…

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